जब देश में घंूघट प्रथा का दाैर था, तब एक युवती अपने हाथों में हॉकी की स्टिक थामे देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी। जीवन का एक मात्र सूत्र था- जिंदगी जिंदादिली का नाम है। विषम परिस्थितियों में खुद को साबित करने वाली हॉकी खिलाड़ी सुनीता चंद्रा अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन मप्र के गौरव की गाथा में ये हमेशा अग्रणी रहेंगी। सोमवार को 76 साल की उम्र में उनका आकस्मिक निधन हो गया। इस पर भोपाल के हॉकी खिलाड़ियाें ने अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं। सुनीता चंद्रा के बेटे गौरव ने बताया कि- मां ने हमें जीवन में सफलता के कई मंत्र लिए। हमने उनके जीवन से कई चीजें सीखीं और उनका अनुसरण किया। उन्होंने जिंदगी को जिंदादिली के साथ जिया। जिससे हमें हमेशा खुश रहने की सीख मिला। विषम परिस्थितियां में न घबराना और संघर्ष करना उन्हीं से सीखा। शायद यही वो गुण थे जिन्होंने उन्हें एक सफल खिलाड़ी बनाया।
सुनीता का जन्म अमृतसर में 5 अक्टूबर 1944 को हुआ था। 1995-96 मेें उन्हें भोपाल में महिला हॉकी को बढ़ाने का दायित्व दिया गया। इसी समय खेल विभाग के आग्रह पर उन्होंने मप्र हॉकी अकादमियों का खाका तैयार किया। वे लंबे समय तक मप्र क्रीड़ा परिषद की सदस्य रहीं और प्रदेश के खेल पुरस्कारों की चयन समिति में सेवाएं दी। उन्होंने दिल्ली के सेंट थामस स्कूल में पढ़ते हुए 1958 के राष्ट्रीय खेलों में हिस्सा लिया। उसके बाद दिल्ली विवि से ग्रेजुएशन किया। उन्होंने हॉकी के अलावा बास्केटबॉल, वॉलीबॉल व एथलेटिक्स में दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया। सुनीता ने पूर्व डीजी यतीश चंद्रा से विवाह किया और भोपाल आ गईं।
1966 में मिला था अर्जुन अवॉर्ड-सुनीता चंद्रा मप्र की पहली महिला अर्जुन अवॉर्डी खिलाड़ी थी। उन्हें 1966 में भारत सरकार ने अर्जुन अवॉर्ड से अलंकृत किया। सुनीता ने 1956 से 1966 तक भारतीय हॉकी महिला टीम का प्रतिनिधित्व किया और इस दौरान 1963 से 1966 तक वे भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान भी रहीं। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने जापान और श्रीलंका से टेस्ट सीरीज खेली है। सुनीता 100 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैचों में देश का प्रतिनिधित्व किया।
तत्कालीन राष्ट्रपति से अर्जुन अवॉर्ड ग्रहण करते हुए हॉकी इंडिया कीं सुनीता चंद्रा।
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source https://www.bhaskar.com/mp/bhopal/news/mp-news-sunita-stopped-hockey-for-the-country-during-the-veil-064045-6487526.html
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