मप्र में 26 पारंपरिक बीज बैंकों की स्थापना की जाएगी। इनमें पारंपरिक बीजों को सहेजा जाएगा, इन्हें लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। ताकि बीजों की स्थानीय किस्म या वैरायटी लुप्त होने से बच जाए। प्रदेश के हर दो जिलों के बीच एक बीज बैंक बनाने की योजना है।
यह जानकारी देते हुए मप्र राज्य जैव विविधता बोर्ड के सदस्य सचिव आर श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि स्थानीय या पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए 2017 में अभियान शुरू किया गया था। इसे बीज यात्रा का नाम दिया गया था। यात्रा राज्य 37 जिलों में पहुंची थी। यहां किसानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से स्थानीय बीजों की पहचान की गई। अब जिन किसानों के पास पारंपरिक और पुराने बीज थे, उन्हें सहेजने की नई तकनीक बताई जाएगी। यह अभियान 2018 में भी चलाया गया। इस बार बीज नायकों का सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें किसानों ने अपने बीजों की प्रदर्शनी भी लगाई। करीब 58 किसान इसमें शामिल हुए। प्रदर्शनी में किसानों ने एक दूसरे को बीजों को आदान -प्रदान भी किया।
प्रशिक्षण दिया जाएगा किसानों को
बीज नायकों में कुछ लोगों का चयन किया जाएगा। इन्हें जैव विविधता बोर्ड में बीजों के संरक्षण की वैज्ञानिक विधि सिखाई जाएगी। इसके अलावा अन्य ट्रेनिंग भी जाएगी। ताकि परंपरागत बीजों को बचाया जा सके।
पद्मश्री बाबूलाल दहिया के मुताबिक वैज्ञानिक भी मान चुके हैं कि जैविक खेती के लिए पारंपरिक बीज हाइब्रिड की तुलना में ज्यादा कारगर हैं। एक बीज अपने अंदर हजारों गुणसूत्र संजोए रहता है। बाहरी या हाइब्रिड टिकाऊ नहीं है। इन्हें आप थर्ड जेंडर की तरह मान सकते हैं। परंपरागत बीजों में थ्री स्टेज तक खरपतवार से लड़ने की क्षमता होती है। इन्हें प्रकृति से सहयोग भी मिलता है। उसी के आधार पर यह विकसित होते हैं। जबकि हाइब्रिड बीजों में एेसा संभव नहीं है। कई हाइब्रिड बीज दूसरी बार उत्पादन ही नहीं दे पाते हैं।
गुणधर्म बदले बगैर उत्पादन क्षमता बढ़ाने के हो प्रयास
बीज नायकों के सम्मेलन में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त किसान योगेंद्र कौशिक ने भी सुझाव दिए। उन्होंने कहा, कृषि वैज्ञानिक पारंपरिक बीजों के गुणधर्म को बदले बगैर उनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की कोशिश करें। इससे परंपरागत बीजों को आसानी से बचाया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि पारंपरिक बीज का उत्पादन कम होता है। इससे किसान इन्हें कम लगाते हैं। ज्यादातर किसान उन्हीं किस्मों को लगाते है जिनसे उत्पादन अधिक हो। जबकि पांरपरिक किस्मों के बीज में हाइब्रिड की तुलना में मौसम से लड़ने की अधिक शक्ति होती है। प्रतिकूल मौसम को भी इन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है। उन्होंने बंसी गेहूं का उदाहरण देते हुए बताया कि इसका उत्पादन कम होता और लागत अधिक आती है। जबकि यह गेहूं पौष्टिकता के मामले में सबसे अच्छा गेहूं है।
योगेंद्र कौशिक
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source https://www.bhaskar.com/mp/dhar/news/mp-news-seed-banks-will-be-built-to-conserve-seeds-071058-6594330.html
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