इंदौर (सुनील सिंह बघेल).सरकार द्वारा नगरपालिका अधिनियम में संशोधन के बाद सभी यह मानकर चल रहे हैं कि महापौर का चुनाव पार्षदों द्वारा पार्षदों में से ही किया जाएगा। हो सकता है सरकार की असली मंशा भी यही हो। हालांकि 9 अक्टूबर को संशोधन का जो अध्यादेश जारी किया गया है, वह अलग ही कहानी कह रहा है।
अध्यक्ष तथा महापौर का निर्वाचन बताने वाली धारा (18) में से एक वाक्य “ने हुए पार्षदों में से”(फ्रॉम द इलेक्टेड काउंसलर) हटा दिया है। इसके चलते गैर पार्षद के भी महापौर के पद पर दावे का संदेह पैदा हो गया है। मप्र नगर पालिका अधिनियम की धारा 17 में पार्षद, महापौर पद के लिए जरूरी योग्यता बताई गई है।
महापौर के लिए 25 वर्ष उम्र और निर्वाचक नामावली में नाम होने की अनिवार्यता है। संशोधित अध्यादेश में यह तो कहा गया है कि महापौर का चयन पार्षद करेंगे, लेकिन गजट नोटिफिकेशन में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि महापौर पद के लिए पार्षद होना जरूरी है या मेयर का चुनाव चुने हुए पार्षदों द्वारा ही किया जाएगा।
एक वाक्य हटाने से पैदा हुई भ्रम की स्थिति
एक्ट में संशोधन के पहले नगरपालिका अधिनियम की धारा 18 में सिर्फ सभापति के निर्वाचन, अधिकार आदि का वर्णन था। इसी धारा में संशोधन कर सभापति के साथ-साथ महापौर का शब्द भी जोड़ दिया गया है। अब इसका शीर्षक “अध्यक्ष तथा महापौर का निर्वाचन” कर दिया गया है। संशोधन के पहले अधिनियम में स्पष्ट था कि सभापति का चुनाव चुने हुए पार्षदों (फ्रॉम द इलेक्टेड काउंसलर्स) द्वारा होगा। अब सिर्फ यह कहा गया है कि राज्य निर्वाचन आयोग स्पीकर तथा मेयर के चुनाव के लिए 15 दिन के भीतर चुने हुए पार्षदों का सम्मेलन बुलाएगा।
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source https://www.bhaskar.com/mp/indore/news/amendment-to-the-municipal-act-but-it-is-not-clear-whether-the-election-of-the-mayor-is-qualified-only-from-the-councilors-or-outside-126102490.html
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