कोरोना काल में प्रकृति खिली-खिली नजर आ रही है। सारे कल-कारखाने, औद्योगिक इकाइयाँ, आवागमन आदि उपक्रम बंद हैं। औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से केमिकल युक्त दूषित पदार्थ नदियों में प्रवाहित ना होने से नर्मदा का जल स्वच्छ हो चुका है। नहरों का पानी भी मनोहारी व पारदर्शी हो चुका है। नर्मदा में जल जीव दिखाई देने लगे हैं, जबकि लाखों रुपये खर्च करके भी स्वच्छता कार्यक्रम के बावजूद ऐसा परिणाम नहीं निकला। आसमान एकदम साफ है। शहर में हर तरफ दृश्य इतना सुंदर होता है मानो दीवार पर लगी कोई तस्वीर देख रहे हों। आवागमन के बंद होने से आबोहवा की शुद्धता स्तर में अप्रत्याशित सुधार हुआ है। बाग-बगीचे चिड़ियों के कलरव से गूँज रहे हैं। आलम ऐसा है कि पहले लोग घड़ी का अलार्म सुनकर जागते थे, परंतु वहाँ अब चिड़ियों के कोलाहल से लोग उठने लगे हैं।
स्वच्छंद होकर विचरण कर रहे हिरण
जंगलों में पर्याप्त आश्रय को तरसते जानवर खुलेआम विचरण करते नजर आ रहे हैं। डुमना नेचर पार्क में हिरणों की संख्या भी बढ़ी दिख रही है। वानर भी जमकर उछल-कूद करते नजर आ रहे हैं। नेचर पार्क बंद होने से तमाम जानवर और पक्षी अनुपम आजादी महसूस कर रहे हैं। स्वच्छता को लेकर वर्षों का रिकॉर्ड टूटा है। निश्चित रूप से पर्यावरण के शुद्ध होने पर धरा मुस्कुरा रही है।
स्वच्छता के प्रति गंभीर हुए लोग
लॉकडाउन के चलते लोगों की जीवनशैली भी बदली है। फास्ट फूड व विलासिता पूर्ण जीवन पर कुछ हद तक विराम लगा है। अनावश्यक खर्च बंद हुए हैं। परोपकार की भावनाएँ जगी हैं, एकजुटता आई है। स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति लोग गंभीर हुए हैं। पुरानी स्वस्थ परंपराएँ याद आ रही हैं। आने वाले दिनों में भी इसकी याद रहेगी और लोग सतर्क रहेंगे। यह एक सकारात्मक संकेत है। लोगों के घर में रहने से हमारी जीवन दायनी नर्मदा सहित अन्य नदियों का जल निर्मल हो गया है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों का मानना है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी हमें इसी प्रकार प्रकृति का ख्याल रखना होगा, क्योंकि हमारा वजूद भी कुदरत पर ही टिका है, जिसे सँवार कर ही मानव जाति को बरकरार रखा जा सकता है।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/jabalpur/news/changes-in-the-lockdown-due-to-the-escape-of-the-changing-lifestyle-of-the-people-there-was-a-tremendous-change-in-the-nature-127296353.html
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