Tuesday, March 31, 2020

अवाम की अमानत है ‘प्रेम-हंसी-दर्द-विरह’ से भरी रफी साहब की आवाज **


पहले ही दे दिया मौत का संकेत

अपनी मौत से कुछ समय पहले रफी ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जोड़ी की एक रिकॉर्डिंग में हिस्सा लिया था। इसका एक किस्सा लक्ष्मीकांत ने बयां किया था कि उस दौरान उनका बिहेवियर थोड़ा अजीब था। जाते समय बोले कि-भाइयो, अब जा रहा हूं। लक्ष्मीकांत को आश्चर्य हुआ, क्योंकि वे कभी आने जाने का जिक्र नहीं करते थे। कुछ समय बाद ही रफी को दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे। 31 जुलाई 1980 को जब रफी साहब का निधन हुआ तो उस दिन मुंबई में तेज बारिश हुई। उसके बावजूद करीब 10 हजार लोग अंतिम यात्रा में शरीक हुए थे।

रफी साहब ने बाकायदा संगीत की औपचारिक शिक्षा ली थी। उस्ताद अब्दुल वाहिद खान, पंडित जीवन लाल और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत के गुर सीखे थे। बचपन में उनका घर का नाम ‘फीको’ था। वह अपने गांव के एक फकीर के गाने भी ध्यान से सुनते थे और उन्हें दोहराते थे। यही उनका रियाज होता था। यही उनकी आवाज की विविधता और बड़े स्केल की शुरुआत थी। बाद में यही उनकी गायकी की पहचान बनी।

अमिताभ ने एक किस्सा सुनाया था। एक बार किसी टूर में प्रस्तुति देकर रफ़ी साहब लौट रहे थे। वे वापसी प्लेन में बैठने तैयार थे। तभी पता चला कि अगले दिन के लिए तयशुदा गायक कलाकार का आना कैंसल हो गया। अब कार्यक्रम खतरे में पड़ गया। ऐसे में अमिताभ ने वापसी के लिए विमान में जोन को तैयार रफ़ी साहब से रिक्वेस्ट की कि एक दिन और रुक जाएं। रफ़ी साहब ने रत्ती भर नानुकुर नहीं की और फटाफट फ्लाइट छोड़कर वापस आ गए। ऐसे सहज थे मो. रफी।

जब गाने के पैसे लिए हैं तो रॉयल्टी क्यों लू?

रफी ने यूं तो लता मंगेशकर के साथ कई गाने गए, लेकिन एक बार इन दोनों के बीच मतभेद भी पैदा हुए थे। लता गानों की रॉयल्टी दिए जाने की समर्थक थीं वहीं रफी ने रॉयल्टी के विरोधी। वे मानते थे कि एक बार जब गाने के पैसे िमल गए तो फिर रॉयल्टी किस बात की। दोनों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि बातचीत भी बंद हो गई। चार साल बाद वे एक मंच पर आए जब नरगिस ने दोनों को कार्यक्रम में बुलाया। वहां उन्होंने साथ में ‘दिल पुकारे..’ गीत गाया।

शम्मी के कहने पर गाने में डाला मस्ती वाला लहजा

रफी एक बार ‘कश्मीर की कली’ फिल्म के लिए ‘सुभान अल्लाह हाय, हसीं चेहरा...’ की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। शम्मी कपूर ने उनके आगे जिद पकड़ ली कि, यह गाना वह उछल–कूद करके पेश करना चाहते हैं। आप अपनी गायकी में उछल–कूद का लहजा भर दीजिए। आखिरकार रफी साहब को उनकी बात माननी पड़ी और फिर आगे ऐसे मस्ती भरे गाने भी उनकी पहचान बने। बाद में उन्होंने शम्मी के लिए ‘चाहे मुझे कोई जंगली कहे’ भी गाया।

नौशाद के निवेदन पर गायकी में लौटे

हज करने के बाद रफी साहब ने इंडस्ट्री को छोड़ने का इरादा कर लिया था। वह नए गायकों को मौका देना चाहते थे, पर कुछ लोगों ने यह दुष्प्रचार फैला दिया कि रफी की मार्केट वैल्यू खत्म हो गई है। इस स्थिति को देखते हुए नौशाद साहब ने उनके निर्णय में दखल देते हुए कहा- ‘तुम्हारी आवाज अवाम की अमानत है और तुम्हें अमानत में खयानत करने का कोई हक नहीं।’ उनके इन शब्दों को सुनने के बाद रफी सिंगिंग में वापस लौट आए।

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे/ जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे/ संग-संग तुम भी गुन गुनाओगे।

आ ज बात सुरों की दुनिया के एक ऐसे फनकार की जिसकी आवाज को अवाम की अमानत माना गया। जिनके गीतों में प्रेम, हंसी, शोक, दर्द, आह, खामोशी, मिलन, विरह जैसी मानव जीवन की सारी भावनाओं हमें देखने को मिलती हैं। 40 साल के फिल्मी गायन के सफर में उन्होंने 25 हज़ार से अधिक गाने रिकॉर्ड करवाए और उनकी आवाज का जादू उनके जाने के चालीस साल बाद भी कम नहीं हुआ है। ये गायक थे माे. रफी साहब। आज बात उन्हीं मो. रफी की-

13 साल की उम्र में अकेले संभाला स्टेज

रफी साहब की गायकी की शुरुआत का एक किस्सा है। जब एक स्टेज शो के दौरान बिजली चली गई तो उस जमाने के जाने-माने गायक केएल सहगल ने स्टेज पर गाना गाने से मना कर दिया। रफी भी उस वक्त वहां मौजूद थे। उनकी उम्र 13 साल थी। तब रफी ने स्टेज संभाला तो सिंगिंग का ऐसा कमाल दिखाया कि सभी दंग रह गए। यहीं से उनकी किस्मत खुली।

इतना रियाज किया कि गले से खून आ गया

‘बैजू बावरा’ के सॉन्ग ‘ऐ दुनिया के रखवाले’ के लिए रफी कई दिन इतना ऊंचा सुर लगाया कि जब इसकी रिकॉर्डिंग की तो उनके गले से खून तक आने लगा था। उनकी आवाज कुछ ऐसी प्रभावित हो गई कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि रफी साहब अब शायद ही कभी गा पाएं, लेकिन इसके बाद भी रफी ने हार नही मानी और कई हिट गाने गाए।

Á साल 1948 में रफी ने राजेन्द्र कृष्णन द्वारा लिखा हुआ गीत ‘सुनो-सुनो... ऐ दुनिया वालों बापू की यह अमर कहानी’ गाया था। यह इतना बड़ा हिट हो गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपने घर पर यह गाना गाने के लिए निमंत्रण दिया था।

Á रफी ने न केवल सिंगिंग में ही बल्कि एक्टिंग में भी हाथ आजमाया था। उन्होंने ‘लैला मजनू’ और ‘जुगनू’ फिल्म में बतौर एक्टर काम किया था।

Áरफी साहब ने ज्यादातर गाने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जोड़ी के लिए गाए। उन्होंने उनकी फिल्मों के लिए करीब 369 गाने गाए थे जिसमें से 186 सोलो सॉन्ग्स शामिल हैं।

Á वे किसी भी संगीतकार से कभी यह नहीं पूछते थे कि उन्हें गाना गाने के एवज में कितना पैसा मिलेगा। कभी-कभी सिर्फ 1 रुपए में भी उन्होंने फिल्मों में गाना गाया है। कई बार तो वे गीतकार से फीस लेकर उन्हीं के बच्चों की जेब में पैसा डाल देते थे।

Á रफी साहब को बचपन में पढ़ने-लिखने से ज्यादा उन्हें नदी किनारे या पेड़ों के झुरमुट में बैठकर सीटी बजाना और गीत गाना पसंद था। ऐसा करने के लिए उनकी एक बार जमकर पिटाई भी हुई थी।

कुछ अन्य खास बातें**

लॉकडाउन के दौर में सभी यादों के गलियारे में सफर कर रहे हैं। ऐसे में हमारे कॉलम ‘क्या आप जानते हैं’ में हम आपको हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों और हस्तियों से रू-ब-रू करा रहे हैं जो इस सफर में मील के पत्थर हैं और आज भी मिसाल हैं।

क्या आप जानते हैं **



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