Friday, December 18, 2020

चने की नई किस्म आरबीजी-202 का प्रजनन बीज तैयार, पाला के दौरान भी नुकसान की संभावना कम

सीहोर स्थित दलहन अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने चने की नई देसी किस्म (आरबीजी-202) बनाई है। इसकी खासियत यह है कि इसमें पाला पड़ने की संभावना कम रहेगी। प्रजनन बीज (किस्म का पहला बीज) बड़वानी जिले के तलून स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने तैयार किया। जिसे सरकार ने महाराष्ट्र और गुजरात भेजा। यहां पर इसकी बुआई की गई है। पहली बार प्रदेश के बाहर जिले में तैयार हुआ प्रजनन बीज देश के अन्य राज्यों में भेजा।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एसके बड़ोदिया ने बताया दो साल से यहां चने की नई किस्म का प्रजनन बीज तैयार कर रहे है। पहली बार गवर्मेंट ऑफ इंडिया ने मप्र में ही सप्लाय किया था। इस साल नासिक, पुणे, ओरंगाबाद व गुजरात सहित मप्र के होशंगाबाद, नरसिंहपुर जिले में भेजा गया है। यहां के किसानों ने बड़वानी में तैयार किए गए बीज की बुआई इस साल की है। इससे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी।

22 एकड़ में 152 क्विंटल तैयार किया प्रजनन बीज
वैज्ञानिकों ने बताया तलून स्थित कृषि विज्ञान केंद्र ने 20 एकड़ भूमि में नई किस्म का 152 क्विटंल प्रजनन बीज तैयार किया। जिसे गुजरात, महाराष्ट्र और मप्र में सप्लाय किया गया।

नई किस्म की ये खासियत
चने की पुरानी किस्मों की तुलना में इस किस्म का चना उगता कम है। इसमें पाला पड़ने की संभावना कम रहती है। पौधे की ऊंचाई भी पौने दो फीट तक रहती है। पैदावार प्रति हेक्टेयर में 22 से 25 क्विं. तक रहती है।

नई किस्म की जरूरत
वैज्ञानिकों की मानें तो किस्म की एक उम्र होती है। जैसे-जैसे किस्म पुरानी होती है। वैसे-वैसे ही उसका प्रभाव कम होने लगता है। यही वजह है पुरानी किस्म के बीच से तैयार फसल में पाला पड़ता है या उगरा लगता है।

चने की नई किस्म : वैज्ञानिकों के अनुसार चने की अभी नई किस्म आरबीजी 201,202 व 203 है। 204 व 205 पर काम चल रहा है।

दो विधि से तैयार होती है नई किस्म

सेलेक्शन विधि
इस विधि के तहत अलग-अलग क्यारियों में पुरानी किस्म बोई जाती है। इन क्यारियों में जो पौधा सबसे ज्यादा अच्छा रहता है। इनका सेलेक्शन कर चना तैयार होता है। 10 से 15 सालों तक विधि अपनाई जाती है। पूरी अवधि में वैज्ञानिक अलग-अलग तरह के प्रयोग करते हैं।
क्राॅस विधि
दो किस्मों को क्राॅस करते समय पहले एक किस्म के फूल में से मेल वाला पार्ट हटा देते हैं। दूसरी किस्म के मेल पार्ट को पहली किस्म के फीमेल पार्ट से मिला देते हैं। इससे दोनों किस्म से एक किस्म तैयार होती है। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है लेकिन तैयार बीज में नए गुण होते हैं।

बीज किसान तक ऐसे पहुंचता है

कृषि वैज्ञानिक नई किस्म तैयार करने के लिए अनुसंधान केंद्र में 10 से 15 साल तक शोध करते हैं। किस्म बनने के बाद गवर्मेंट ऑफ इंडिया अधिसूचना जारी करती है। कृषि विज्ञान केंद्रों को प्रजनन बीज तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए बीज देते हैं। बीज की जांच होती है फिर गवर्मेंट ऑफ इंडिया इसे किसानों को भेजने के लिए बीज निगम को उपलब्ध कराती है।

डिमांड और बीमारियों को ध्यान में रखकर ही करते हैं नए शोध

चने की नई किस्म तैयार करते समय हम ये देखते हैं कि किस तरह के चने की बाजार में डिमांड है। कौन सी बीमारियां चल रही हैं? मौसम कैसा है? जमीन की उर्वरक शक्ति कैसी है? जो किस्म अभी चल रही है इसमें क्या कमियां है? किसानों की अन्य जरुरतों को भी ध्यान में रखते हैं। एक किस्म तैयार करने में ज्यादा समय इसलिए लगता है, क्योंकि इसका कई बार परीक्षण (शोध) होता है। एक किस्म को तैयार होने में 8-10 बार जनरेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जब वैज्ञानिक संतुष्ट हो जाते हैं तो 2 बार मप्र में इसकी टेस्टिंग होगी। इसके बाद ऑल इंडिया टेस्टिंग होती है। इसके बाद ही किस्म को ओके मानते हैं। अब जो किस्म तैयार कर रहे हैं, इनके तैयार करते समय ध्यान दे रहे हैं कि अब किसानों को कटाई के लिए लेबर नहीं मिलती व हार्वेस्टर चलवाना पड़ता है। पहले किस्म के दाने छोटे व पौधे की ऊंचाई कम होती थी। अब नई किस्म बनने के बाद चने का दाना बढ़ा होने लगा है व पौधा भी। मप्र में तैयार होने वाली चने की किस्म पूरे भारत में बोई जा रही है। फूल में मेल व फीमेल दोनों पार्ट रहते हैं। दो किस्मों को क्राॅस करते समय पहले एक किस्म के फूल में से मेल वाला पार्ट हटा देते हैं और दूसरी किस्म के मेल पार्ट को पहली किस्म के फीमेल पार्ट से मिला देते हैं।



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source https://www.bhaskar.com/local/mp/khandwa/khargone/news/breeding-seed-of-new-gram-variety-rbg-202-ready-less-possibility-of-loss-even-during-rearing-128026545.html

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