20 मार्च को चार पॉजिटिव के साथ जिले व प्रदेश में कोरोना की दस्तक हुई थी। तीन महीने लॉकडाउन में बीतने के दौरान भी मरीज मिलते रहे और प्रशासन मेडिकल में बेहतर इलाज के दावे करता रहा। लेकिन अब 6 महीने बीतने के बाद भी मेडिकल कॉलेज यह भरोसा नहीं दिला सका कि वहाँ कोविड मरीजों का ठीक इलाज होता है। प्राइवेट अस्पतालों में गंभीर से गंभीर मरीज ठीक हो रहे हैं, जितने मरीज मेडिकल में हैं उससे कहीं ज्यादा निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं।
मेडिकल की तुलना में लोग कर्ज लेकर भी निजी अस्पताल को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि जान बच जाएगी। निजी अस्पताल का खर्च न उठाने वाले ही मेडिकल पहुँच रहे हैं, उनके परिजनों को भी उनकी हालत की जानकारी नहीं मिलती। मेडिकल प्रबंधन 6 महीने बाद अब सुपर स्पेशिएलिटी के साफ शौचालयों की तस्वीरें जारी कर खुद की सक्रियता दिखा रहा है। वहाँ इलाज में गड़बड़ी की शिकायतें आम हैं, उनको दूर कर मरीजों व परिजनों का भरोसा जीतने क्या किया गया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हाँ किसी मरीज की मौत होने पर परिजनों को जरूर फोन किया जाता है।
बेहतर उपचार देने के हर मोर्चे पर हारा प्रबंधन
कोविड संकट में बेहतर इलाज मुहैया कराकर मेडिकल प्रबंधन के पास पुरानी छवि को सुधारने का बेहतर मौका था। शुरूआती दौर में ऑक्सीजन लाइन के साथ ही बेहतर इलाज के लिए बड़ी तादाद में खरीदी भी हुई, लेकिन इलाज पर फोकस नहीं रह सका। आज भी मेडिकल की कैजुअल्टी का यह हाल है कि वहाँ मरीज को ठीक से जाँचने, भर्ती करने की बजाए यही कोशिश की जाती है कि वह कहीं और चला जाए। आम चर्चा है कि मेडिकल में सीनियर डॉक्टर कोविड वार्ड में नहीं जाते, एचआर के भरोसे ही मरीज रहते हैं। ये हाउस रेसीडेंट भी कितने दिन बाद अंदर जाते हैं इसके लिए सीसीटीवी फुटेज होने का दावा तो किया जाता है लेकिन अभी तक इन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया। 6 महीने बीतने के बाद अभी तक मेडिकल प्रशासन ने वहाँ के इलाज की कोई फुटेज या सीनियर डॉक्टर्स की टीम की फोटो नहीं दी, हाँ शौचालयों की सफाई का खूब बखान हो रहा है।
यह है हालिया प्रमाण बीते रविवार सिहोरा की एक महिला व बेटी पॉजिटिव आए। महिला पूर्व से ही बीमार थी। उसे तत्काल इलाज की जरूरत थी, सुपर स्पेशिएलिटी के बाहर तीन घंटे वह एम्बुलेंस में लेटी रही। कोई वार्ड में लेने तैयार नहीं था, डीन व कोविड नोडल अधिकारी को कई फोन लगाए गए लेकिन किसी ने फोन रिसीव नहीं किए। बाद में मेडिकल के एक सीनियर डॉक्टर के हस्तक्षेप से उन्हें स्ट्रेचर में दूसरी मंजिल स्थित वार्ड के बाहर तक ले जाकर छोड़ दिया गया। वहाँ किसी डॉक्टर ने उन्हें देखने की जरूरत नहीं समझी, इस दौरान उनकी बेटी सभी से मदद की गुहार लगाती रही। दो घंटे बाद वार्ड में बेड तो मिला लेकिन इलाज फिर भी शुरू नहीं हुआ। रात में वे बिस्तर से जमीन पर गिर गईं, कोई उठाने नहीं आया। बेटी ने परिचितों को इस घटना की जानकारी दी तो रात में ही उन्हें वहाँ से निकालकर निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत तो ये हैं कि यहाँ के कुछ सीनियर डॉक्टर्स पॉजिटिव होने के बाद मेडिकल की बजाय निजी अस्पताल में भर्ती हुए, शायद उन्हें भी यहाँ के इलाज पर भरोसा नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि जब मुख्यमंत्री, चिकित्सा शिक्षा मंत्री भोपाल में मेडिकल कॉलेज की बजाय निजी अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं तो वे क्यों नहीं?
विक्टोरिया का आईसीयू आज शुरू होगा- कोविड संकट में जब आईसीयू, वेंटीलेटर व ऑक्सीजन सबसे अहम थी तभी विक्टोरिया अस्पताल का आईसीयू तोड़ कर नया बनाने का गैर जरूरी निर्णय लिया गया। चार महीने बाद अब यह बनकर तैयार हो गया है। 20 बेड का यह आईसीयू अब बुधवार से शुरू होने जा रहा है।
जिला अस्पताल में होंगी सभी जाँचें- सिविल सर्जन डॉ. सीबी अरोरा ने बताया कि कोविड मरीजों के लिए आवश्यक 14 प्रकार की जाँचों को जिला अस्पताल की ही पैथोलॉजी में नि:शुल्क किए जाने की तैयारी पूरी हो गई है। मेडिकल में ये जाँचें निजी पैथोलॉजी से कराई जा रही हैं।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/jabalpur/news/only-1509-points-behind-10000-positives-132-deaths-due-to-kovid-10-times-more-suspected-127745042.html
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