Friday, November 22, 2019

जिंदगी में ‘रूल बुक' से चलना चाहिए या नहीं?

बात जब कानून-कायदों की आती है तो जिंदगी में कई दोराहे आते हैं, जहां हम ठहर जाते हैं और सोचते हैं कि क्या करना चाहिए? उलझन होती है कि हमें नियमों यानी ‘रूल बुक\' के हिसाब से चलना चाहिए या फिर उन्हें नजरअंदाज कर देना चाहिए? पिछले हफ्ते दो अलग-अलग शहरों के दो अलग-अलग लोगों ने, दो अलग-अलग कारणों के लिए दो अलग-अलग फैसले लिए और वे दो प्रेरक उदाहरण बन गए!

पहली कहानी : 15 नवंबर की सुबह पुणे के 38 वर्षीय देवेंद्र अपनी प|ी और 7 महीने की बेटी के साथ नासिक के लिए रवाना होने वाले थे। उन्होंने जाने से पहले बेटी को खाना खिलाया। अचानक बेटी का गला चोंक हो गया और उसने कुछ देर पहले खिलाए दाल-चावल उल्टी करके निकाल दिए। उसकी सांस उखड़ रही थी और वह जोर से हांफने लगी। देवेंद्र डर गया कि कहीं उसकी सांस ही न थम जाए। वह डॉक्टर की तलाश में निकला, लेकिन उसके पड़ोस के क्लिनिक में डॉक्टर नहीं मिला। वह आते-जाते लोगों को रोककर उनसे मदद मांग रहा था। देवेंद्र पर क्या गुजर रही थी, इस बात से अनजान फूड एग्रीगेटर जोमेटो का कर्मचारी रवि ढोकरे, पुणे के एक दूसरे हिस्से में अपने ऐप पर लॉग ऑन करता है। रवि को तुरंत एक ऑर्डर मिल जाता है और वह उसे लेने निकल पड़ता है, तभी उसकी नजर देवेंद्र पर पड़ जाती है।

एक पिता की पुकार ने रवि को वहां रुकने पर मजबूर कर दिया और वह देवेंद्र को नजदीकी अस्पताल तक ले जाने को तैयार हो गया। बच्ची को लेकर वे सबसे पहले 2 किमी दूर सालुंके हॉस्पिटल पहुंचे। लेकिन वहां पर कोई डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं था। वहां से वे 2.6 किमी दूर जाधव हॉस्पिटल पहुंचे तो वहां के अटैंडेंट ने कहा कि उन्हें 4.3 किमी दूर कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल जाना पड़ेगा। जोमेटो का वह मददगार कई छोटे-संकरे, अंदरूनी रास्तों और गलियों से होता हुआ सिर्फ 10 मिनट में उन्हें लेकर तीसरे हॉस्पिटल पहुंच गया। जब वे तीनों कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल पहुंचे, तो लगभग 20 मिनट बीत चुके थे। डॉक्टर ने बच्ची को तुरंत इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया, साथ ही यह भी कहा कि जरा भी देर घातक हो सकती थी। बच्ची की पीड़ा देखकर रवि कुछ देर वहीं रुका जब तक कि उसकी हालत स्थिर न हो गई। उसने वहीं से अपने ग्राहकों को पार्सल डिलीवरी में हो रही देरी के बारे में कारण सहित बताया। इस घटना को एक हफ्ता हो गया, लेकिन रवि अभी देवेंद्र से संपर्क कर बच्ची की सेहत की जानकारी लेता रहता है। जोमेटो ने रवि की नेकी के लिए उसे बुधवार को सम्मानित किया।

दूसरी कहानी : 2 नवंबर को जनार्दन शर्मा नामक व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी कि अहमदाबाद के योगिनी सर्वाज्ञपीठम आश्रम में तीन बच्चों को अवैध रूप से रखा गया है। बात जब शाम के बाद कहीं छापा डालने की होती है तो पुलिस को बहुत कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। लेकिन एडीजीपी अनिल प्रथम ने बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) की मदद ली। जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) को बैक-अप रहने के लिए सतर्क किया। सीडब्ल्यूसी और डीसीपीयू की सुरक्षा के लिए पुलिस को भेजा, जिसने उन्हें छापे की वैधता साबित करने में सक्षम बनाया। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा-30 के अनुसार, बाल कल्याण समिति बच्चों की सुरक्षा और भलाई (30बी) से संबंधित और प्रभावित करने वाले सभी मुद्दों पर जांच करने की शक्ति रखती है। समिति ने इस केस का संज्ञान लिया और देखभाल, सुरक्षा के उद्देश्य से बच्चों तक पहुंच गई। इस कार्रवाई ने अहमदाबाद में विवादास्पद धर्मगुरु नित्यानंद के आश्रम में कथित रूप से चल रहे अवैध गतिविधि से पर्दा उठाने का काम किया।





फंडा यह है कि  जब रूल बुक का उपयोग करने या न करने के बीच उलझन हो तो ज्ञान, अनुभव और मानवता ही सही फैसला करने में मदद करते हैं।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

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DEREE News - mp news should i follow the 39rule book39 in life or not
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source https://www.bhaskar.com/mp/chhatarpur/news/mp-news-should-i-follow-the-39rule-book39-in-life-or-not-071113-6005899.html

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