Friday, September 18, 2020

नालियों के बीच पेयजल लाइनें, पानी काे गंदगी से बचाने निगम की तैयारी नहीं

कोरोना, डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के बाद अब शहर पर टायफाइड यानी मोतीझरा का प्रकोप शुरू हो गया है। अस्पतालों में टायफाइड के मरीज लगातार मिल रहे हैं। यह बीमारी गंदे और दूषित पानी से होती है और अक्सर बारिश के दौरान या बारिश के बाद ही इसका प्रकोप अधिकतर देखा जाता है। शहर में नगर निगम द्वारा जलापूर्ति की जाती है और इसके लिए जो पाइप लाइनें डाली गई हैं वे नालियों से ही होकर घरों तक जाती हैं। बारिश में गंदा पानी पाइप लाइनों को अपनी जकड़ में ले लेता है और इस दौरान लीकेज के जरिए गंदा पानी सीधे लोगों के घरों तक पहुँच जाता है। ऐसे में टायफाइड के साथ ही पेट की अन्य बीमारियाँ भी तेजी से होती हैं। निगम के पास फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है जिससे नालियों से पाइप लाइनों को हटाया जा सके।

चिकित्सकों का कहना है कि टायफाइड अब तेजी से पैर पसार रहा है और लगातार मरीज मिल रहे हैं। बीमारी का मुख्य कारण दूषित जल ही है। ऐसा नहीं कि केवल नगर निगम का पानी पीने से ही यह बीमारी होती है, बल्कि ठेलों और सड़क किनारे बिकनी वाली दूषित खाद्य सामग्री खाने से भी लोग बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। हालाँकि इन दिनों कोरोना के कारण वैसे भी लोग घर का ही खाना खा रहे हैं और बाहर की खाद्य सामग्री से बच रहे हैं इसके बाद भी यदि वे टायफाइड से ग्रसित हो रहे हैं तो इसका पूरा दोष नगर निगम की पेयजल व्यवस्था को दिया जा रहा है।

ट्रीटमेंट प्लांट से साफ पानी छोड़ते हैं
नगर निगम का दावा है िक चाहे ललपुर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट हो या फिर रमनगरा प्लांट यहाँ से पानी को पूरी तरह साफ करके ही टंकियों में भेजा जाता है। इन प्लांटों में पानी को साफ करने के लिए क्लोरीन, एलम, ब्लीचिंग पाउडर और चूना का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद जब पानी को टंकियों में भेजा जाता है तब तक भी कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन असली मुसीबत होती है घरों तक होने वाली सप्लाई में।

लैब में जाँच भी होती है- बताया जाता है कि ललपुर और रमनगरा वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में लैब भी बनाई गई हैं और यहाँ सुबह और शाम को पानी की जाँच की जाती है। जो पानी नदी से लिया जाता है पहले उसकी जाँच कराई जाती है और फिर जब पानी को फिल्टर करके टंकियों में भेजा जाता है तब उसकी दोबारा जाँच की जाती है। सरस्वती काॅलोनी में अभी भी जो पानी घरों में पहुँच रहा है वह मटमैला है और दूषित है। ऐसा ही पानी शहर के कई क्षेत्रों में मिल रहा है। निगम अधिकारी कहते हैं कि जब नल चालू हो तो कुछ देर पानी को बहने दिया जाना चाहिए, उससे गंदा पानी निकल जाता है।

नालियों से नहीं हट सकीं लाइनें -अधिकांश पेयजल लाइनें नालियों के सहारे ही घरों तक पहुँचती हैं। पाइप लाइनों में लीकेज हो जाते हैं जिससे नालियों का गंदा पानी लीकेज के जरिए पाइप लाइन के अंदर चला जाता है और फिर यह पानी घरों तक पहुँच जाता है। जिन घरों में फिल्टर प्लांट है या जो लोग पानी को उबालकर पीते हैं वे तो स्वस्थ रहते हैं, लेकिन जो असावधान रहते हैं बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

अमृत योजना की लाइनें दफ्न हो गईं
बताया जाता है कि अमृत योजना से कई क्षेत्रों में नई पाइप लाइन डाली गईं, लेकिन अभी तक उनका उपयोग ही नहीं किया जा रहा है। ये लाइनें नालियों से अलग हैं इसलिए इन्हें सुरक्षित माना जाता है, लेकिन जब उपयोग ही नहीं किया जाएगा तो इनका क्या काम। खुद निगम के ही अधिकारी बताते हैं कि 3 से 4 साल हो गए हैं इन पाइप लाइनों को डाले हुए ऐसा ही रहा तो यह हमेशा के लिए जमीन में ही दफ्न हो जाएँगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा।

शिकायतें मिलने पर मरम्मत होती है
जिन भी क्षेत्रों से शिकायतें आती हैं कि पानी दूषित आ रहा है या फिर बदबू आ रही है, कचरा मिल रहा है तो उन क्षेत्रों की पेयजल लाइनों की जाँच कराई जाती है और जहाँ भी लीकेज होता है उसे सुधारा जाता है। फिलहाल नालियों से पाइप लाइन को हटाने की कोई योजना नहीं है, क्योंकि पाइप का जाल तो पूरे शहर में फैला है और अधिकांश लाइनें नालियों के आसपास से ही गई हैं।
-कमलेश श्रीवास्तव कार्यपालन यंत्री नगर निगम



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बजबजाती नालियों के बीच से गुजरती पेयजल पाइप लाइन, इन्सेट में इस तरह मटमैले पानी की हो रही सप्लाई।


source https://www.bhaskar.com/local/mp/jabalpur/news/drinking-water-lines-between-drains-corporation-not-ready-to-save-water-from-dirt-127732671.html

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