मशहूर शायर डॉ. राहत इंदौर का मंगलवार को निधन हो गया। वे कोरोना वायरस से पीड़ित थे। वे खंडवा में अदब की महफिलों, मुशायरों व कवि सम्मेलनों की रौनक हुआ करते थे। फानी दुनिया को अचानक अलविदा कहने से उनके तमाम चाहने वाले सदमे में हैं। कोरोना काल में उनकी पूर्व की रचना “बुलाती है मगर जाने का नई, वो दुनिया है उधर जाने का नई। वबा (महामारी) फैली हुई है हर तरफ अभी माहौल मर जाने का नई’ हर किसी की जुबान पर रही। शहर काजी व शायर सैयद अंसार अली ने कहा राहत साहब पहली बार खंडवा में 1975 में मुशायरा पढ़ने आए थे। यहां आयोजित मुशायरे व कवि सम्मेलनों में शामिल होने के लिए कभी मना नहीं करते थे। राहत साहब के निधन पर खंडवा के शायरों ने कहा कि शायरी बेवा हो गई।
राहत इंदौरी के साथ 100 से ज्यादा मुशायरों में मंच साझा कर चुके शायर सूफियान काजी ने बताया अंजुमन तरक्की उर्दू खंडवा की जानिब पहली बार आए तब उन्हें फीस के रूप में 100 रुपए नजराना दिया गया। खंडवा के मुशायरों में वे अकसर कहते थे यहां मैंने पहली बार 100 रुपए में मुशायरा पढ़ा। काजी हसन रजा, काजी अंसार, डॉ. मुजफ्फर हनफी, हिफाजत खंडवी, दिलकश सईद ने मुशायरों में उन्हें कई बार बुलाया।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/khandwa/news/mushaira-was-read-for-the-first-time-in-khandwa-for-100-rupees-127610347.html
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