हरेकृष्ण दुबोलिया | भोपाल .बीते पांच साल में ब्रेन ट्यूमर के मरीजों का सर्वाइवल रेट महज 30 फीसदी है। क्योंकि मस्तिष्क की बायोस्पी सिर्फ एक बार ही की जा सकती है। यदि सटीक डायग्नोस नहीं हुआ तो सही इलाज मुश्किल होता है। ज्यादातर केसों में बायोप्सी के बाद अधिकतम 14 महीने के अंदर मरीज की मौत हो जाती है। अब इस समस्या का समाधान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए निकाल लिया गया है।
मस्तिष्क की कंप्यूटेड इमेजिंग के जरिए एक न्यूरल नेविगेशन डिवाइस तैयार कर ली गई है, जिसे जीपीएस मैप या हिटमैप नाम दिया गया है। इस तकनीक की अब तक 200 केस में रेट्रोस्पेक्टिव स्टडी की जा चुकी है, जिसमें 90 फीसदी तक सटीक परिणाम आए हैं। 2021 की शुरुआत के साथ ही इसका प्रोस्पेक्टिव क्लिनिकल ट्रॉयल शुरू होने की संभावना है। यह तकनीक 100 फीसदी सफल साबित हुई तो यह विश्व मानवता के कल्याण में एक अहम खोज साबित होगी।
इस तकनीक को चार ईमली की ही डॉ. पल्लवी तिवारी ने ईजाद किया है। इस पर ईरानी मूल के अमरिकी न्यूरोसर्जन डॉ. अलीरेजा मोहम्मदी ट्रॉयल कर रहे हैं। डॉ. पल्लवी और डॉ. अलीरेजा दोनों ही अमेरिका के ओहियो राज्य स्थित केस वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। डॉ. पल्लवी केस स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में पदस्थ हैं। डॉ. अलीरेजा क्लेवेलैंड क्लीनिक के ब्रेन ट्यूमर एंड न्यूरो-ओंकोलॉजी सेंटर में कार्यरत हैं। यूनिवर्सिटी ने अपने न्यूज लेटर ‘द डेली’ (https://ift.tt/2QUk3QL) में 20 दिसंबर 2019 को इसकी सफलता की जानकारी देते हुए क्लिनिकल ट्रॉयल की तैयारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।
बायोप्सी के बिना भी ब्रेन ट्यूमर का पता चल सकेगा
डॉ. पल्लवी ने भास्कर को बताया कि जीपीएस मैप के जरिए ब्रेन ट्यूमर कहां और कितना है, इसका सटीक पता लगाया जा सकेगा। अक्सर ब्रेन ट्यूमर की जांच में बायोप्सी के लिए सैंम्पलिंग में गलतियां होती हैं। मस्तिष्क की संरचना जटिल होने से इसकी बायोप्सी भी एक बार ही कर सकते हैं, इसलिए रैंडम सैंपलिंग काफी जोखिम भरी होती है। ब्रेन ट्यूमर काफी एग्रेसिव कैंसर होता है। बायोप्सी के बाद इलाज ठीक नहीं हुआ तो अधिकतम 14 महीने में ही मरीज की मौत हो जाती है। ब्रेन ट्यूमर में ज्यादातर मौंते रिकरेंस (फिर से कैंसर लौटने) के कारण होना बताई जाती हैं।
जबकि हकीकत यह है कि सही डायग्नोस नहीं होने के कारण या तो सटीक स्थान पर इलाज हो ही नहीं पाता या गलत स्थान पर कीमो थैरेपी के रेडिएशन के कारण मौत होती है। रूटीन एमआरआई स्कैन में रेडिएशन का प्रभाव और ट्यूमर का फिर से पैदा होना दोनों दिखाए जाते हैं। लेकिन जीपीएस मैप में कंप्यूटेशन इमेजिंग से मरीज का पर्सनलाइज्ड डायग्नोस्टिक किया जाएगा। इस तकनीक को कंप्यूटेशनल एल्गोरिदम से फिट कर और जीपीएस मैप बनाकर सर्जन अपने एमआरआई मशीन में उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए कैंसर हॉटस्पॉट का हिट-मैप होगा। जिसे पहचान कर ट्यूमर वाले घाव के भीतर की सही बायोप्सी साइट खोजी जा सकेगी।
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source https://www.bhaskar.com/mp/bhopal/news/where-and-how-much-brain-tumor-is-hitmap-will-reveal-the-exact-address-126450680.html
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