Saturday, January 25, 2020

‘शहीद’ देख शास्त्री जी ने पूछा, मेरे नारे-‘जय जवान...’ पर फिल्म बना सकते हैं क्या?**


मे रा बचपन पाकिस्तान में ही बीता है। वहां के तीस हजारी हॉस्पिटल में मेरा भाई पैदा हुआ था। उस वक्त भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था तो दंगों का माहौल बना हुआ था। जब कभी हॉस्पिटल में दंगाई आते थे तो एक सायरन बजता था। उसे सुनकर हॉस्पिटल के डॉक्टर, नर्स सब नीचे जाकर छिप जाया करते थे। उस हॉस्पिटल में मेरी मां एडमिट थी और भाई बीमार था। दोनों का इलाज चल रहा था। ऐसे ही एक दिन दंगाइयों के आने की खबर फैली, सायरन बजा और सारे डॉक्टर नर्स भीतर चले गए। इसी दौरान मेरे भाई की सांस उखड़ गई। मेरी मां चिल्लाती रही, डॉक्टर या नर्स को बुलाओ पर कोई नहीं आया। मेरा भाई चल बसा। उस वक्त मैं गुस्से से लाल पीला हो गया। पास में पड़ा लट्ठ उठाया और डॉक्टर और नर्सों को पीटने लगा। बाद में मां को पता चला तो वह मुझ पर नाराज हुईं। उन्होंने कहा कभी हिंसा का सहारा मत लेना। मां की उस सीख का मैंने ताउम्र अपनी जिंदगी में अमल किया। अपनी फिल्मों में भी अहिंसा के इसी सिद्धांत को उभारा।

मुंबई आने से पहले अपने दिल्ली प्रवास के दौरान मैं नई सड़क जाया करता था। वहां पत्रिकाएं मिला करती थीं। मैं वो पत्रिकाएं खरीदा करता था, क्योंकि उसमें क्रांतिकारियों की वीरता की कहानियां हुआ करती थीं। खासकर भगत सिंह के बारे में। मैंने बहुत पहले से ही भगत सिंह के बारे में लिखना और रिसर्च करना शुरू कर दिया था। भगत सिंह पर दो फिल्में पहले ही बन चुकी हैं और वह चली नहीं हैं, उसके बावजूद हम लोगों ने ‘शहीद’ शुरू की। फिल्म का पहला शॉट शुरू होने को था और मैं मेकअप रूम में दाढ़ी लगा रहा था। सीताराम शर्मा ने मुझसे ही पूछना शुरू कर दिया कि भाई क्या करना है? कैसे करना है? इस पर मैंने कहा-मुझे क्या पता? ऐसी स्थिति देखकर तो फिर हमने कहा कि यार अभी शूटिंग कैंसल करो, डायरेक्टर ढूंढो। वहां मौजूद लोगों ने कहा कि यार किसी तरह से तो फिल्म के लिए पैसे जुटाए हैं। आज का दिन तू किसी तरह से संभाल ले फिर देखते हैं। तो शूट के पहले दिन ही मेरे सिर पर डायरेक्शन का जिम्मा आ गया। तो सरदार भगत सिंह की वह फिल्म मुझे डायरेक्ट करनी पड़ गई।

देशप्रेम की फिल्में मेरे प्रारब्ध में ही थीं

हमारी उस फिल्म शहीद ने ही आगे की बुलंद इमारत तैयार की। उसके प्रीमियर पर लाल बहादुर शास्त्री आए। उन्होंने बड़ी तालियां बजाईं। स्टेज पर आकर भाषण भी दिया। बड़ा आशीर्वाद दिया। रात को 2 बजे मेरे पास फोन आया कि शास्त्री जी ने मुझे और मेरे साथियों को चाय पर बुलाया है। सुबह चाय पर शास्त्री जी ने कहा कि- हमारी इस फिल्म शहीद को देखकर वह रात भर सो नहीं पाए हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने नारा दिया है ‘जय जवान जय किसान’ क्या उस नारे पर हम लोग फिल्म बना सकते हैंै? मैंने उनके पांव छुए और कहा कि आपने साेचा है तो जरूर बनेगी।’ उनका आशीर्वाद लेकर मैंने अपने परम मित्र केवल से कहा कि मुझे एक डायरी दे दो और दो चार बॉल पेन दे दो। मैं डीलक्स ट्रेन में दिल्ली से बैठा। गाड़ी फरीदाबाद से निकली। सर्दियों के दिन थे। गेहूं की लाइनें लगी हुई थीं। हरे-हरे खेत नजर आ रही थी। पहली लाइन मैंने लिखी, ‘यह धरती ऐसी हथेली है, जिस पर किसान हल चलाकर इंसान की तकदीर लिखता है। मैं सारी रात सोया नहीं, मुंबई पहुंचने तक ‘उपकार’ की कहानी लिख चुका था। इस तरह की देशप्रेम से लबालब फिल्म बनाना मेरे प्रारब्ध में ही था। यहां डायरेक्टर बनने नहीं आया था। यह सब कुछ प्रभु की इच्छा थी। फिर ‘उपकार’ का प्रीमियर हुआ। पहली बार राष्ट्रपति जाकिर हुसैन राष्ट्रपति भवन से बाहर निकलकर प्रीमियर पर आए। मेरे सारे दोस्तों ने मना किया था कि हर कोई राज कपूर नहीं बन जाता, इसलिए एक्टिंग से डायरेक्शन में मत आओ। मैंने उनसे कहा कि मैं तो फिल्म इंडस्ट्री में बाबूजी के पांव छूकर के आया था। मुझे फिल्मों से किसी कमाई की इच्छा नहीं है। उस पर लोगों ने मुझसे यह भी कहा कि ‘कसमे वादे प्यार वफ़ा सब...’ जैसा गाना प्राण जैसे प्रचलित खलनायक से गवाओगे। पागल हो गए हो क्या? मैंने कहा पागल ही समझो पर यह गाना तो प्राण ही गाएंगे।

रहा सवाल मेरी एक और पेट्रियोटिक फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ का तो उसका कॉन्सेप्ट मेरे जहन में ऐसे आया था कि जब बंटवारे के बाद हम लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए थे तो मैं लाहौर मिस करता था। जहां मेरी पैदाइश थी, यानी ऐबटाबाद को मिस करता था। फिर जब काम के सिलसिले में दिल्ली से मुंबई आया तो दिल्ली की गलियों को मिस करता था। इस तरह मैंने सोचा कि जो लोग जरूरी काम से और रोजी-रोटी को अपने मुल्क को छोड़कर बाहर के देशों में रहते हैं, वह अपना वतन कितना याद करते होंगे। इस कॉन्सेप्ट को मैंने डवलप कर ‘पूरब और पश्चिम’ बनाई।

(जैसा कि अमित कर्ण को बताया)

देशप्रेम की फिल्में बनाने का जुनून कैसे आया, यह खुद बयां कर रहे हैं मनोज कुमार...**

1965 में फिल्म ‘शहीद’ के प्रीमियर पर तत्कालीन पीएम लाल बहादुर शास्त्री के साथ मनोज कुमार और फिल्म की कास्ट। (फाइल फोटो)

भास्कर कॉन्सेप्ट **

(मनोज कुमार, अभिनेता व निर्देशक)



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source https://www.bhaskar.com/mp/bhopal/news/mp-news-seeing-39shaheed39-shastriji-asked-can-i-make-a-film-on-my-slogan-39jai-jawan-39-064047-6478940.html

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