Friday, September 18, 2020

पानी के कारण सोयाबीन से हुए दूर, पानी से ही धान की 10 गुना पैदावार, अपग्रेड तरीके से रोपाई और पानी की उपलब्धता के कारण प्रॉडक्टिविटी रेट भी जबर्दस्त

कभी सोयाबीन खरीफ की मुख्य फसल हुआ करती थी लेकिन किसानों का इस फसल से धीरे-धीरे इस तरह मोह भंग हुआ कि इसका रकबा घटकर 70 हजार हेक्टेयर में रह गया। इसकी जगह ले ली धान ने। नर्मदा के किनारे वाले गांवों में धान खरीफ की मुख्य फसल हो गई है। इसकी वजह है पर्याप्त पानी के साथ भूमि एवं वातावरण अनुरूप होना। वर्ष 2020-21 में 1 लाख 65 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई हुई है। किसान कुल धान के रकबे में से 70 फीसदी में बासमती की पैदावार कर रहे हैं। बासमती धान का स्वाद और इसकी सुगंध अब देशभर में पहुंच रही है। बासमती धान के उत्पादन में जिला प्रदेश में प्रथम है।
जिले में धान की उन्नत किस्में जैसे पूसा 1637, पूसा 1718, पूसा 1728, सिल्की, पूसा 1121, जेआर 206, पूसा सुगंधा 4 इत्यादि किस्मों को उगाया जा रहा है जो कि रोग प्रतिरोधी किस्में हैं। प्रति एकड़ लगभग 25 से 30 क्विंटल पैदावार होती है। सामान्य धान की तुलना में बासमती से किसानों को प्रति हेक्टेयर अधिक आमदनी प्राप्त होती है। इधर, अपग्रेड तरीके से रोपाई और पानी की उपलब्धता के कारण प्रॉडक्टिविटी रेट भी जबर्दस्त बढ़ा है। वर्ष 2011 में साढ़े 31 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था जो 2015 में 44 क्विंटल पहुंच गया। पिछले साल 2019 में धान की भी उत्पादकता 50 क्विंटल पर पहुंच गई। जिले में हर साल रकबा बढ़ रहा है। 25 हजार हेक्टेयर में बोवनी 2010 में की गई थी जो अब 1.61 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। उत्पादन 8.06 लाख मीट्रिक टन हुआ। सोयाबीन के प्रति रुझान घट रहा है। हाल ही में तेज बारिश में सोयाबीन को भारी नुकसान पहुंचा।

साेयाबीन : फसल लागत का एक तिहाई उपज मूल्य नहीं मिला

1990 से 2000 तक साेयाबीन जिले की प्रमुख फसल रही लेकिन 2000 के बाद किसानाें का रुझान धान की तरफ बढ़ा। दरअसल, जिले में सामान्य से अनियमित ज्यादा बारिश से साेयाबीन जड़ से सड़ने लगता है। केवल धान को ही फायदा हाेता है। जिले का कुल रकबा 3 लाख 25 हजार हेक्टेयर है। पहले जिले में दाे लाख हेक्टेयर भूमि पर सोयाबीन लगाया जाता था। अब 1 लाख 65 हजार हेक्टेयर में धान पहुंच गई तो 75 हजार हेक्टेयर में साेयाबीन रह गई है। बाकी में मक्का और ज्वार है।
पांच साल पहले जिले के सातों ब्लॉकों में फसल लागत में साेयाबीन का एक तिहाई भी उपज मूल्य नहीं मिला। सरकार 5x5 फीट खेत में 1.3 किलो औसत उत्पादन मानती है, लेकिन सर्वे में अभी तक किसी भी ब्लॉक में 400 ग्राम से अधिक सोयाबीन नहीं मिला था। इससे किसानों को कटाई कराना भी महंगा पड़ गया। कई किसान खेतों को सोयाबीन सहित बखर दिए थे। इससे जिले में सोयाबीन से किसानों को काफी नुकसान हुआ था। नतीजा 10 साल में किसान ने धान की तरफ रूख कर लिया।

1.3 किलो औसत उत्पादन मानती है सरकार 5x5 फीट खेत में, लेकिन सर्वे में अभी तक किसी भी ब्लॉक में 400 ग्राम से अधिक सोयाबीन नहीं मिला था।

धान के अनूकूल- मौसम की दशाओं में फसलों के उगाने के तौर तरीकों और उत्पादन की मात्रा पर असर पड़ रहा है। कई सालों से लगातार सोयाबीन की फसल खराब होना या कम उत्पादन की स्थिति बन रही है। जिले में जहां पहले जहां सोयाबीन की फसल अच्छी होती थी अब वहां बदली हुई बारिश की दशाओं के कारण किसान धान उत्पादित करने लगे हैं। बदलते परिवेश में किसानी का भी ट्रेंड बदल रहा है।

वैज्ञानिक पद्धति के साथ ही किसान बेहतर उत्पादन वाली फसलों का चयन करने लगे हैं। अन्य फसलों में लगातार हो रही नुकसान के बाद किसान अब धान-मक्का फोकस कर रहे हैं। वैसे भी जिले की जलवायु और मौसम इनके उत्पादन के लिए अनुकूल है।

ऐसी फसल जो खरीफ-रबी दोनो लगने लगी
बदलते मौसम के चलते रबी-खरीफ दोनों सीजन में फसलों का ट्रेंड बदल गया है। किसान खरीफ में हेक्टेयर में करीब 45 क्विंटल मक्का का उत्पादन ले रहे है तो रबी के समय उत्पादन 65 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक लेते हैं। होशंगाबाद की डोलरिया तहसील व हरदा जिले के किसान अपने खेत में मक्का लगा रहे हैं। नवंबर में मक्का लगाया जाता है। फसल तीन महीने में पक कर तैयार हो जाती है। हाईब्रिड पाइनियर किस्म की मक्का गेहूं और बारिश के सीजन में लगाया जाने वाली मक्का की फसल से ज्यादा उत्पादन देती है। जिले में 60 हजार हैक्टेयर में मक्का लगाई जाने लगी है।

लगातार एक फसल नुकसान

एक ही फसल की बोवनी से जमीन की उर्वरक क्षमता प्रभावित होती है। सोयाबीन की लगातार बोवनी करने से भी अधिक नुकसान होता है। सोयाबीन के विकल्प के रूप में धान, उड़द और मक्का की बाेवनी करने की सलाह दे रहे हैं। इस कारण भी सोयाबीन का रकबा कम हो रहा है।
जितेंद्र सिंह, कृषि उपसंचालक

किसान ग्रीष्मकालीन मुख्य फसल के रूप में मूंग की खेती करते हैं। मूंग की उन्नत किस्में जैसे एमएच 421, हम-12, हम-16, शिखा पीडीएम 139 एवं विराट जो कि रोग प्रतिरोधी किस्में है। इन फसल कम अवधि की होने के साथ अधिक आमदनी देती है जिसके प्रति रुझान बढ़ रहा है।
डाॅ देवीदास पटेल, वैज्ञानिक केविके गाेविंदनगर



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होशंगाबाद. धान का रकबा 10 साल में जबर्दस्त बढ़ा है। अिनयमित व अधिक बारिश के कारण किसानों का सोयाबीन से मोह भंग हो गया। यही पानी धान के लिए वरदान बन गया है।


source https://www.bhaskar.com/local/mp/hoshangabad/news/away-from-soybean-due-to-water-10-times-yield-of-paddy-from-water-transplanting-in-an-upgraded-manner-and-availability-of-water-also-increased-productivity-rate-127732683.html

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