Friday, January 17, 2020

अफसोस होता है जब चीखों का हिंदुस्तान देखता हूं, नारों का हिंदुस्तान देखता हूं- राहत इंदौरी

भास्कर संवाददाता | बुरहानपुर

ख्यात शायर राहत इंदौरी शनिवार को बुरहानपुर में होंगे। वे स्व. अमित शर्मा साहित्य, कला एवं क्रीड़ा समिति द्वारा कराए जा रहे ‘एक शाम राहत इंदौरी के नाम’ कवि सम्मेलन और मुशायरे में शिरकत करेंगे। इंदिरा कॉलोनी स्थित स्व. परमानंद गोविंदजीवाला ऑडिटोरियम में शाम 7 बजे से शुरू होने वाले मुशायरे में उनके साथ नईम अख्तर, जॉनी बैरागी रविंद्र रवि, निशा पंडित, मणिका दुबे और डॉ. रमेश धुआंधार भी काव्य पाठ करेंगे। इससे एक दिन पहले राहत इंदौरी ने भास्कर से विशेष चर्चा की।

हिंदुस्तान, उर्दू, शायरी, बुरहानपुर और नए शायरों को लेकर राहत इंदौरी ने भास्कर से खास बातचीत की, बाेले-किसी फनकार के लिए परफेक्शन आिखरी लफ्ज हो जाता है

देश के वर्तमान हालातों को एक शायर होने के नाते आप किस नजर से देखते हैं?

- मैं तो साहब हिंदुस्तान को उसी नजर से देखता हूं, जो शक्ल मेरे बचपन में बनी हुई थी। जो मेरे बुजुर्गों ने मुझे बताया था हिंदुस्तान। जो मेरे बुजुर्गों के ख्वाबों का और मेरे ख्वाबों का हिंदुस्तान था। असल में मैं आजादी के बाद पैदा हुआ हूं तो आजादी के बाद जो मैने हिंदुस्तान देखा था, वो हिंदुस्तान आज भी चाहता हूं। मुझे भी अफसोस होता है जब चीखों का हिंदुस्तान देखता हूं, नारों का हिंदुस्तान देखता हूं। इंसानों को सड़कों पर रेंगते हुए देखता हूं तो अफसोस होता है। मैं दुआ करता हूं खुदा से कि हिंदुस्तान फिर वही हिंदुस्तान हो जाए, जिसकी हर शाख पर सोने की चिड़िया होती थी।

बुरहानपुर सदियों से उर्दू अदब का शहर रहा है। यहां की माटी में ही शायरी बसी है।

- दारूसुरूर (सदाबहार)कहा जाता है इस शहर को। उर्दू अदब की जब तारीख पढ़ी जाती है तो फ्रॉम द एवरी बिगिनिंग, हाशिम बुरहानपुरी का नाम पढ़ने में आता है तो हमें हाशिम नया लगने लग जाता है और बुरहानपुर और पुराना लगने लग जाता है। उर्दू के शुरुआती मर्कज रहे हैं। उससे ज्यादा पहले से बुरहानपुर का नाम हम पढ़ते आए हैं और उर्दू की खिदमत होती रही है। हर दौर में बुरहानपुर में अच्छे लिखने वाले रहे हैं। आज भी हैं, ये खुशी की बात है।

आप उर्दू अदब में तो जाना-पहचाना नाम हैं लेकिन टिक-टाॅक एप के कारण बच्चों में भी खासे लोकप्रिय हो गए हैं।

- मुझे मेरे बच्चों ने ही दिखाया। टिक-टॉक मैं तो जानता नहीं हूं। मुझे मोबाइल के सिलसिले में कुछ ज्यादा मालूमात है नहीं। यह एक तरीके से शायरी की मकबूलियत है अौर शायरी की मकबूलियत अगर बच्चों तक पहुंच रही है तो यह एक अच्छा शगुन है कि बच्चों से चलकर बड़ों तक पहुंचेगी।

आपने कहा था मैंने अभी तक वह शेर नहीं लिखा, जिससे मुझे मेरे जाने के बाद भी जाना जा सके। क्या वह शेर आप लिख चुके हैं?

- किसी भी फनकार के लिए परफेक्शन जो होता है, वो आखिरी लफ्ज हो जाता है। और आखिरी लफ्ज हो जाता है तो उसका मतलब यह है कि जिस काम के लिए ईश्वर ने, अल्लाह ने उसे जमी पर उतारा है, वो खत्म हो गया है। मैं अपनी शायरी से खुश हूं, मुतमइन नहीं हूं। मैं चाहता हूूं कि वहां तक पहुंचुं, जहां तक हमारे बुजुर्ग पहुंचे, बड़े नाम पहुंचे, मुझसे पहले जो सीनियर पहुंचे। ऐसे बीसों, दर्जनों शेर हैं, जो सारी दुनिया में मेरे शेर हवा की तरह तैर रहे हैं। सारी दुनिया में। मुझे सारी दुनिया के कोने-कोने से फोन आते हैं और वहां से मेरे शेर सुनाए जाते हैं लेकिन मुझे अच्छा भी लगता है कि भई मेरा शेर सुनने वाला यूरोप में है, कैनेडा में है, अमेरिका में है, हर जगह है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मुझे अभी भी वो शेर कहना चाहिए जो मेरे मरने के बाद जिंदा रह सके। शायद वो मैंने अभी नहीं कहा है। इसलिए मैं जिंदा हूं। मालिक करें कि मैं ऐसा शेर लिख पाऊं, जो मुझे जिंदा रखे।

वर्तमान दौर में उर्दू अदब के हालात पर क्या कहेंगे?

- उर्दू के हालात बहुत बेहतर हैं। उर्दू जो हिंदुस्तान में पैदा हुई। हैदराबाद, दिल्ली, लखनऊ, अलीगढ़ यहीं तक सीमित रही लेकिन अब दुनिया के कोने-कोने में पहुुंच रही है। अब उर्दू की पत्रिकाएं, उर्दू के अखबारात, उर्दू के मुशायरे अास्ट्रेलिया में हो रहे हैं। जर्मनी में हो रहे हैं। चीन में हो रहे हैं। पाकिस्तान तो खैर हिंदुस्तान का ही हिस्सा रहा। इसके अलावा यूएस में कहीं भी जाइए। यह हिंदुस्तान में ऐसा लगता है हमें, उर्दू की तरफ कम देख रहे हैं तो दुनिया के दूसरे देशों में उर्दू पनप रही है, पढ़ी-लिखी जा रही है।

यहां पहले भी आना हुआ है। उस दौरान का अनुभव कैसा रहा?

- 20-25 साल में 10-20 बार तो आया होंगा। बुरहानपुर के लोग बहुत अच्छा शेर सुनते हैं। शायरी की जो एप्रोच होना चाहिए, शायरी, मुशायरा जो होता है, सिर्फ सुनाने का हुनर नहीं होता है। सुनने का भी हुनर होता है। हमें खुशी होती है जब किसी शहर में जाते हैं और शेर सुनाते हैं और उस शेर को सही तरीके से जो हमने कहा है, उसके मतलब तक, उसके अर्थ तक, अगर हमारा श्रोता पहुंच जाता है तो बहुत ज्यादा खुशी होती है। कम बस्तियां हैं, जहां शेर की एप्रोच लोगों तक होती है लेकिन यह है कि हमारे बुरहानपुर में ऐसे सुनने वाले हजारों की तादाद में आ जाते हैं। जहां शायर को शेर सुनाकर खुशी होती है।

नए शायरों के लिए कोई संदेश देना चाहते हैं।

- अभी नए शायर बुरहानपुर में भी काफी उभर रहे हैं। उनके लिए बस यही कहूंगा कि वो खूब पढ़ें। खूब लिखने से काम नहीं चलता है। खूब पढ़ने से काम चलता है। अच्छा लिखने की पहली शर्त ये होती है कि अच्छा पढ़ें। मैं अक्सर कहता भी ये हूं कि कोई जरूरी नहीं कि आप उर्दू के राइटर हैं तो उर्दू का ही साहित्य पढ़ें। दुनिया की किसी भी भाषा में अगर आपको अच्छा, सेहतमंद लिटरेचर मिल रहा है तो उसे पढ़िए। उसका फायदा आपकी भाषा को ही पहुंचेगा।



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Burhanpur News - mp news sadly when i see the india of screams i see the hindustan of slogans rahat indori


source https://www.bhaskar.com/mp/burhanpur/news/mp-news-sadly-when-i-see-the-india-of-screams-i-see-the-hindustan-of-slogans-rahat-indori-070100-6421394.html

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