Friday, June 5, 2020

मानसून के आगाज के साथ सामने आया बाढ़ पीड़ितों का दर्द, सरकार पर सवाल उठाती उनकी वर्तमान हालात

नदी व नाले का पानी एक होने से आई बाढ़ के कारण हुई त्रासदी में अपना सबकुछ गंवा चुके बाढ़ पीड़ित परिवारों को लंबा समय बीत जाने के बाद भी ठिकाना नसीब नहीं हुआ। सरकार व प्रशासन के पुनर्वास के दावे यहां दम तोड़ रहे हैं। गांव में आबाद होने के सपने पूरे नहीं हुए, अब केवल आंखों में तबाही का वो मंजर है जो इन परिवारों ने छत पर चढ़कर या रस्सी के सहारे नाला पारकर, बस्ती से दूर ऊंचे मगरे पर चढ़कर, भीगते पानी में बैठकर 24 घंटे भूखे रहकर गुजारा। सरकार द्वारा कुछ परिवारों को मुआवजा मिला तो वह भी नाममात्र का।

यह दर्द भरी दास्तां मल्हारगढ़ तहसील के गांव सोनगरा की बंजारा बस्ती की है। जहां 14 सितंबर 2019 को शिवना नदी व बस्ती के पास बहने वाले नाले का पानी एक हो गया था, बस्ती में पानी घुस गया, जिससे कच्चे व पक्के मकान धराशायी हो गए। इनमें घर का सामान पानी में बह गया तो सभी पशुओं की मौत हो गई। 24 घंटे भूखे रहने के बाद जब नाले का पानी उतरा तो गांव में गए, जहां स्कूल में सरकार द्वारा भोजन के पैकेट दिए गए।

इनसे पेट की भूख शांत की व कुछ गेहूं-चावल दिए गए। बाढ़ से हुई आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने कुछ परिवारों को नाममात्र का मुआवजा दिया तो कई परिवारों को आज तक कुछ नहीं मिला। ना ही उनको दूसरी जगह विस्थापित किया गया। प्री-मानसून चल रहा है, कभी भी बारिश हो सकती है। ऐसे में इनको बारिश का डर सताने लगा है। बाढ़ पीड़ितों ने सभी जगह गुहार लगाई लेकिन मिले तो केवल आश्वासन।

बाढ़ पीड़ितों की कहानी उन्हीं की जुबानी, जब भी याद आता है वह दृश्य कांप जाती है आत्मा

पानी में भीगते हुए 24 घंटे भूखे रहकर जान बचाई, ग्रामीणों की मदद से हमें भोजन मिला
बाबूलाल भील ने बताया कि बाढ़ का पानी घरों में घुस गया था। 14 सितंबर 2019 की सुबह 11 बजे घरों में पानी भर गया, कच्चा मकान व राशन पानी में बह गए। चारों तरफ पानी ही पानी था। फिर हम लोग बस्ती से कुछ दूर एक मगरा ऊंचा स्थान है, वहां जाकर रहे पानी में भीगते हुए 24 घंटे भूखे रहकर हमने हमारी जान बचाई। नाले का पानी कम हुआ व ग्रामीणों व शासन की मदद से हमें भोजन मिला। सरकार द्वारा हमें 10 हजार रुपए की आर्थिक सहायता दी गई, जिनसे मकान के लिए गड्ढे खुदवा दिए व झोपड़ी बनाकर रह रहा हूं।

बच्चों को सर्दी-जुकाम हो गया, बचने के लिए पड़ोस में मकान की छत पर चढ़कर बैठ गए
ममताबाई पति अर्जुन दायमा ने बताया कि घर के पास नाले का पानी घर में घुसने लगा तो हम पड़ोस में मकान की छत पर चढ़कर बैठ गए। ठंडा पानी होने के कारण मेरे बच्चे को ठंड लगने लग गई तो मैंने बस्ती वालों से मदद मांगी उन्होंने मुझे इधर से उधर नाला पार करवाया। फिर हम मगरे पर तंबू में रहे, ठंडे पानी के कारण बच्चों को सर्दी-जुकाम भी हो गया था। हमें शासन द्वारा कोई सहायता नहीं दी गई है।

आवासीय पट्टे देकर मकान देते तो समस्या का हल हो जाता, बारिश का डर सताने लगा है
सीमा पति मुकेश गरासिया ने बताया कि बारिश में मेरा मकान पूरा धराशायी हो गया था। मकान गिरने के कारण एक बछड़ा भी दब गया था। जिसकी मौत हो गई थी। शासन से केवल 3 हजार रुपए मिले, रहने के लिए जब कोई व्यवस्था नहीं हुई तो हमने समूह पर 1 लाख 50 हजार का लोन लेकर वहीं मकान बना लिया। अब कोरोना काल में मजदूरी नहीं मिलने के कारण किस्त भरना भी मुश्किल हो रही है। बारिश का डर भी सताने लगा, अगर सरकार द्वारा हमें गांव में आवासीय पट्टे देखकर मकान देते तो समस्या का समाधान हो जाता।

मकान, राशन, मवेशी सब डूब गए थे, मुश्किल से बचाई जान, सरकार ने दिए 8400 रुपए
डालीबाई पति जीवन ने बताया कि बारिश में हमारा मकान डूब गया था। फिर हमारे परिजन का एक पक्का मकान है जिसकी छत पर हम चढ़ गए। चारों तरफ तबाही का मंजर था। रात को हम 9 बजे तक छत पर बैठे रहे फिर ग्रामीणों ने हमारे घर के पास बह रहे नाले को पार कराने के लिए इधर से उधर बबूल के पेड़ पर रस्सी डाली और मैं मेरे बच्चों को पीठ पर बैठाकर इधर से उधर निकली। घर का सारा राशन तबाह हो गया लेकिन सरकार द्वारा केवल 8400 रुपए मिले, जिससे हमारे लिए मकान बनाना भी संभव नहीं है।

दीवारें भरभराकर गिरने लगी थीं, घरों में रखा अनाज खराब, गेहूं अंकुरित होने लगे थे
सीताबाई पति रामसिंह ने बताया कि हमारे कच्चा मकान है, पिछले साल बारिश में हमारा मकान आधा डूब गया था। दीवारें सभी भरभराकर गिरने लगीं तो हम घरों से बाहर निकलकर सड़क पर रहे। मगरे पर गए, जहां बस्ती वालों ने एक ट्रैक्टर खड़ा किया। वह एक तिरपाल लगाया जिससे पानी का बचाव हो सके, हम रातभर गिरते पानी में मगरे पर भीगते रहे। मुआवजे के नाम पर हमें कुछ नहीं मिला जबकि घरों में भरा अनाज खराब हो गया था, गेहूं अंकुरित होने लगे थे।

छोटे बच्चे हैं, झोपड़ी में हो रहा गुजारा, राशनकार्ड नहीं होने से हमें कोई सहायता भी नहीं मिली
भूरालाल भील ने बताया कि वह झाबुआ का निवासी है लेकिन 20 वर्षों से सोनगरा में रहकर मजदूरी करता है। बारिश में हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया था लेकिन यहां हमारा राशन कार्ड नहीं होने के कारण हमें कोई सहायता नहीं मिल सकी। परिवार के साथ झोपड़ी बनाकर रहा है, बताया कि बारिश सिर पर है, ऐसे में हम जाएं तो कहां, आखिर छोटे बच्चे हैं। यदि इस बार भी पिछली बार की तरह जोर बारिश हुई और बाढ़ आई तो हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी।

नुकसानी की जानकारी शासन को भेजी थी
स्वप्निल तिवारी, पटवारी हलका नंबर 63 ने कहा कि पिछले साल शिवना व नाले के कारण बाढ़ का पानी घरों में भर गया था। इनमें नुकसान हुआ था, कई पशुओं को मौत हो गई थी। आर्थिक सहायता के प्रकरण स्वीकृत हो गए हैं, बाढ़ प्रभावित लोग अभी भी वहीं निवास कर रहे हैं जबकि कुछ परिवारों के गांव में मकान भी हैं। उनको वहां से हटाकर विस्थापित करना जरूरी है। नुकसानी की जानकारी शासन को भेजी थी।



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The pain of flood victims came out with the onset of monsoon, their current situation questioning the government


source https://www.bhaskar.com/local/mp/ratlam/mandsaur/news/the-pain-of-flood-victims-came-out-with-the-onset-of-monsoon-their-current-situation-questioning-the-government-127377922.html

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