इंदौर में रविवार को 44 नए मरीज मिले, 4 की मौत हो गई। मौतों का आंकड़ा अब 201 हो गया। पहली सौ मौतें 54 दिन में हुई थीं। अगली सौ सिर्फ 36 दिन में। देश के 1 % मरीज इंदौर में हैं, पर मौतें 1.5 %। दिवंगतों से जुड़ी हर चीज परिजन को उनकी याद दिलाती रहेंगी। इन्हीं में से कुछ प्रतिनिधि कहानियां। दैनिक भास्कर का प्रयास सिर्फ यह बताना है कि क्यों हर जान इंदौर के लिए बहुमूल्य थी।लघु जीवनियां....
- 15 साल से ज्यादा समाज की सेवा में सक्रिय रहे। तिलकनगर निवासी जैन समाज के फेडरेशन में प्रमुख रहे। उनकी टू-व्हीलर ‘बापू बड़जात्या’ उनकी पहचान थी। मौत के 1 माह बाद रिपोर्ट जारी हुई कि उन्हें कोरोना था।
- महज 8 दिन में अंतर- राज्यीय वाहन चोर गैंग पकड़ने वाले पूर्व टीआई कोरोना को हरा ड्यूटी जॉइन करने वाले थे, पर अचानक जुदा हो गए। थाने में अब भी उनसे जुड़ी चीजें रखी हैं।
- गाड़ी छूते ही खराबी बता देने वाले 57 वर्षीय तकनीशियन। डेढ़ दशक से ज्यादा का अनुभव। पुरानी गाड़ी को नए अंदाज में बना देने का हुनर। यह सूट उनकी पहचान थी।
- 700 से ज्यादा कोरोना मरीजों को स्वस्थ कर चुके इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में सर्जरी विभाग के प्रमुख। कोविड अस्पताल में अधीक्षक थे। वे कहते थे सैनिक मैदान छोड़कर नहीं भागता।
- 70 साल में कारोबार को दूर-दूर तक फैलाने वाले सराफा व्यापारी दोनोंे भाई। दोनों की व्यापारी एसोसिएशन व समाज में अलग पहचान रही।
- परिवार के मना करने के बावजूद बेटे को सेना में भेजने वाले कृषि व ट्रांसपोर्ट व्यवसायी। दोनों क्षेत्र में दो दशक से पहचान। युवाओं का पलायन रोकने गांव में कॉलोनी बना रहे थे।
- हर दिन 70 से ज्यादा मरीज देखने वाले डॉक्टर। मौत के 8 दिन पहले तक मरीजों का उपचार किया। विदेश में रहने वाले दोनों बेटे उनकी अंतिम यात्रा वीडियो काॅल से ही देख पाए।
- कोरोना मरीजों को करीब से संभालने वाले कैंसर अस्पताल में 15 साल से वार्ड बॉय। 150 से ज्यादा मरीज ठीक भी हुए। जिन्हें लोग छूने से डरते, उनके लिए हमेशा तत्पर रहे।
- अपने व्यवहार से शहर में पहचान बनाने वाले 42 वर्षीय फूल विक्रेता। टॉवर चौराहे पर इनकी फूलों की दुकान थी। इनकी बुलेट ही इनकी पहचान बन चुकी थी।
मौतें भी ऐसी कि...
देख ही नहीं पाए
पंचम की फैल में पांच भाई मां के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए। श्मशान में दूर से ही विदाई दी।
छू ही नहीं पाए
गुलजार काॅलोनी में बेटा और मां क्वारेंटाइन थे। अब्बू के इंतकाल की खबर मिली तो तड़पते रह गए।
जान ही नहीं पाए
ब्रुकबांड काॅलोनी का पूरा परिवार भर्ती था। मुखिया की मौत पर कोई समझ ही नहीं पाया क्या हो गया।
कंधा नहीं दे पाए
मिल क्षेत्र की महिला के तीन में से दो बेटे बाहर थे। उन्हें मां को कंधा देना भी नसीब नहीं हुआ।
तर्पण नहीं कर पाए
रामबाग मुक्तिधाम में राख की दर्जनों बोरियां रखी हुईं हैं जिन्हें अब तक तर्पण का इंतजार है।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/indore/news/death-toll-crosses-200-in-indore-100-lives-lost-in-36-days-127434768.html
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