Wednesday, August 26, 2020

‘खुशी और गम कभी स्थायी नहीं रहते, यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है: विजयराजजी

कुछ पाने की स्थिति में मनुष्य खुश होता है और अपने को पुण्यशाली मानता है। वह खुश ही नहीं दूसरों के बीच भी अपनी खुशियों के गीत गाता है और जब कुछ चला जाता है तो दु:खी होकर रोने लगता है। जीवन में प्राप्त धन, यश, सुख, पद और अनुकूलताएं सदैव विद्यमान नहीं रहतीं, इनमें बदलाव आता है। आज का सुख जब दु:ख में परिवर्तित होता है तब वह हजार-हजार आंसू बहाने लग जाता है। खुशी और गम कभी स्थायी नहीं रहते, यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जो इस नियम को समझ लेता है वह इस परिवर्तन में भी तटस्थ व मध्यस्थ बनकर जीने का आनंद ले लेता है।
ये विचार शास्त्री कॉलोनी में स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य विजयराज मसा ने बुधवार को प्रसारित अपने मंगल संदेश में कहे। उन्होंने कहा सच्चाई यह हैै जो लोग वियोग में दु:खी होते हैं और दु:ख के आंसू बहाते हैं, वे नए दु:ख को जन्म देते हैं। दु:ख का समाधान रोना नहीं है, रोकर तो व्यक्ति अपने दु:खों की नई परंपरा को चालू करता है। दु:ख की दवाई न समय है और न कोई सहयोगी है। दु:ख का समाधान समझदारी है। समझदारी के साथ हर दु:ख की वैतरणी को तैरा जा सकता है जो समझदार होते हैं।
आचार्य ने कहा अपने दु:खों को लेकर व्यक्ति जहां भी रहा है वहां वह रोता रहा है। रोना हीन भावना और मानसिक दुर्बलता का सूचक है। जो शूरवीर और साहसी होता हैं वे रोते नहीं बल्कि हंसकर हर दु:ख को स्वीकार कर अपने कर्तव्य में तन्मय हो जाते हैं। यह आंख रूपी ज्योति दीप आंसू बहाने के लिए नहीं है। यदि व्यक्ति मुस्कराता है तो ये ज्योति दीप जगमगा उठते हैं। मुस्कान सुंगध की भांति मन और तन को आनंदित करने वाली होती है। रोना तो जीवंतता की गति में अवरोध पैदा करता है जबकि मुस्कान जीवन को एक लयात्मक और लयात्मक गति प्रदान करती है। रोने के क्षणों में यह बोधात्मक उद्बोधन स्मरण में रखना चाहिए। कोविड महामारी के चलते हर इंसान को सुख-दु:ख को अपने कर्मों का फल समझना चाहिए और शुभ कर्मों में जुटे रहना चाहिए।

कोरोना संक्रमण के चलते तपस्वियों के पारणे घर पर ही हुए
दलौदा| पर्युषण पर्व के साथ ही जैन समाज में तपस्याओं का दौर भी शुरू हो जाता हैं। नगर में पर्युषण पर्व के साथ ही तपस्वियों की तपस्या जारी है। भगवान महावीर स्वास्थ्य केंद्र दलौदा पर विराजित महासती विजयकुंवर मसा के सान्निध्य में तपस्याएं चल रही हैं। जहां तपस्वी प्रमिला दीपक जैन के द्वारा पर्युषण के दौरान सिद्धि तप की तपस्या पूर्ण की गई। वहीं उनके पुत्र द्वारा भी 9 उपवास की तपस्या पूर्ण कर बुधवार को पारणा किया। दोनों तपस्वियों के पारणे कोरोना संक्रमण के चलते घर पर ही कराए गए। वहीं समाजजन द्वारा तपस्वी के घर जाकर अनुमोदना की गई।



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'Happiness and sorrow are never permanent, this change is the law of nature: Vijayrajji


source https://www.bhaskar.com/local/mp/ratlam/mandsaur/news/happiness-and-sorrow-are-never-permanent-this-change-is-the-law-of-nature-vijayrajji-127656684.html

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