संत सिंगाजी ताप विद्युत परियोजना की स्थापना में अपना योगदान व जमीन देने वाले प्रभावित किसान मप्र पावर जनरेटिंग कंपनी द्वारा सालों से ठगे जा रहे हैं। कंपनी द्वारा किसानों के बेटों को नौकरी देने के लिए संयंत्र सहायक पद के लिए परीक्षा ली गई। तीन युवा इसमें सफल रहे। उनका चयन सूची में नाम भी आया। नियुक्ति देने के लिए तीनों युवाओं से मकान तोड़ने की एनओसी भी ली गई। तीनों ने मकान तोड़ लिए, लेकिन साल भर बाद भी उन्हें नियुक्त पत्र नहीं दिया जा रहा है। तीनों युवा बार-बार कंपनी मुख्यालय जबलपुर के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अफसर उन्हें आश्वासन देकर लौटा देते हैं।
मप्र पावर जनरेटिंग कंपनी ने सिंगाजी ताप परियोजना की स्थापना के समय सैकड़ों किसानों की जमीन अधिग्रहित की थी। किसानों को परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा भी किया गया। परियोजना में बिजली उत्पादन शुरू हुए आठ साल हो गए हैं लेकिन प्रभावित किसानों को अब तक न्याय नहीं मिला है। उनके शिक्षिक बेरोजगार बच्चे रोजगार के लिए कई बार धरना प्रदर्शन कर चुके हैं। कांग्रेस सरकार के समय ऊर्जा मंत्री व ऊर्जा सचिव से भी मुलाकात कर पीड़ा बताई, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। 2018 में एमपीपीजीसीएल ने संयंत्र सहायक पद के लिए भर्ती निकाली। इसमें परियोजना प्रभावित किसानों के लिए भी आरक्षण दिया गया। कुछ युवाओं ने आवेदन कर परीक्षा भी दी। 2019 में घोषित परिणाम में शांतिलाल मोजले निवासी भुरलाय, संदीप मोगरे निवासी जलकुआं, संजय सिंह निवासी धारकवाड़ी का चयन सूची में नाम भी आ गया। नियुक्ति के लिए कंपनी ने उनके पुराने मकान तोड़ने की शर्त के साथ एनओसी भी मांगी। उन्होंने मकान तोड़कर यह एनओसी भी प्रस्तुत कर दी। इसके बावजूद अब तक नियुक्त पत्र नहीं दिया जा रहा है। तीनों युवाओं के साथ अन्य प्रभावित किसान भी इसे लेकर चिंतित हैं।
ऊर्जा सचिव की कार के आगे लेट गए थे युवा
करीब पखवाड़े भर पहले प्रदेश के नए ऊर्जा सचिव संजय दुबे ने परियोजना का दौरा किया था। टाउनशिप रेस्ट हाउस से परियोजना जाते समय रास्ते में चयनित तीनों युवा उनकी कार के आगे लेट गए थे। उन्होंने युवाओं को आश्वासन दिया था कि जल्द ही आपकी समस्या का हल निकाला जाएगा। उनका आश्वासन भी अन्य अफसरों की तरह निकला।
अनुदान का दोहरा मापदंड
एमपीपीजीसीएल प्रभावित किसानों के शिक्षित युवाओं को नौकरी देने में दोहरे मापदंड अपना रही है। पहले जिन प्रभावितों को पुत्रों को नौकरी दी गई उस समय अनुदान की कोई नियम नहीं था। बाद में नियम बनाया कि जिन्हें अनुदान मिल चुका है उन्हें नौकरी नहीं दी जा सकती। इसी नियम को लेकर प्रभावित किसान परेशान हैं। वे पहले भी कई बार आंदोलन कर चुके हैं और अब फिर आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/khandwa/news/mppgcl-demolishes-houses-of-affected-farmers-for-jobs-not-giving-appointment-letters-even-after-a-year-127603532.html
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