Saturday, January 4, 2020

कोई नहीं समझ पा रहा बोली वर्ना पहुंच जाती अपने घर

भाेपाल .तीन महीने बाद भी एक महिला केवल अपनाें के पास इसलिए नहीं पहुंच पा रही है क्याेंकि उसकी भाषा किसी काे समझ में नहीं अा रही है। ट्रेन हादसे में दाेनाें पैर खाे चुकी महिला काे हाेशंगाबाद से हमीदिया अस्पताल रेफर किया गया था। भाषा न समझ पाने के कारण हमीदिया अस्पताल प्रबंधन और कोहेफिजा पुलिस उसका परिवार ढूंढने में असफल रही। इसके बाद प्रबंधन ने हारकार उसे स्वयंसेवी संस्था अपनाघर अाश्रम काे साैंप दिया। हमीदिया के अधीक्षक एके श्रीवास्तव ने बताया कि 2 अक्टूबर 2019 अस्पताल में एक महिला को भर्ती किया गया था। उसे हाेशांगाबाद जिला अस्पताल से रैफर किया गया था।

ट्रेन से गिरने की वजह उसके दाेनाें पैर कट गए थे। उसका तीन माह तक इलाज चला। उसके साथ काेई नहीं था इसलिए उसे निराश्रित मान लिया गया। महिला काे अाश्रय देने के लिए सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियाें काे फाेन लगाया। लेकिन काेई जब उसे लेने नहीं अाया ताे उसे स्वयंसेवी संस्था काे साैंप दिया। संस्था ने कमिश्नर या कलेक्टर की अनुमति लिए बिना ही भरतपुर (राजस्थान) स्थित अपने आश्रम में भेज दिया। जानकारों के मुताबिक यह नियम विरुद्ध है।

विभाग की सफाई : नहीं अाई कोई भी सूचना
इस मामले में सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियाें का कहना है कि उन्हें किसी भी तरह की सूचना नहीं दी गई थी। हालांकि विभाग के अधिकारियाें ने माना कि उनके पास मूक बधिर की भाषा के दुभाषिए है, लेकिन अन्य भाषाअाें के दुभाषिए नहीं है। जरूरत पड़ने पर विभिन्न भाषा के जानकार अाैर सामाजिक कार्यकर्ताअाें काे बुला लिया जाता है।

समझ नहीं आ रही भाषा: श्रीवास्तव ने बताया कि महिला की भाषा उड़िया है। कई उड़िया लाेगाें काे बुलाकर जब बात कराने की काेशिश की गई ताे पता चला वह उड़िया ताे बाेल रही है लेकिन अादिवासी उड़िया बोल रही है जिसकी वजह से वे बात समझने में असमर्थ हैं।

भाेपाल के लिए साैंपा : अधीक्षक श्रीवास्तव का कहना है कि उन्हाेंने अपनाघर अाश्रम काे साैंपने के संंबंध में जाे लेटर लिखा है उसकी जानकारी संभागायुक्त, कलेक्टर, काेहेफिजा थाना अाैर गांधी मेडिकल काॅलेज के डीन काे दी है।

शिफ्ट करने के लिए अनुमति जरूरी
जब किसी निराश्रित को शेल्टर देने के लिए भेजा जाता है तो उसे संबंधित जिले में ही रखा जाता है। यदि व्यक्ति काे उसके हिताें की रक्षा के लिए जिले या राज्य से बाहर शिफ्ट करने की अावश्यकता पड़ती है ताे उसके संबंध में संभागायुक्त या कलेक्टर से अनुमति लेना अनिवार्य। एेसा न करना नियमाें का उल्लंघन माना जाता है।
आशुतोषमिश्रा, सचिव जिला विधिक प्राधिकरण


हमारे पास अस्पताल द्वारा साैंपे जाने का पत्र है। चूंकि महिला काे रखने की व्यवस्था नहीं थी इसलिए उसे भरतपुर भेज दिया है। इसके लिए अनुमति की जरूरत नहीं है।
शैलेंद्र त्यागी, नेशनल काेअर्डिनेटर अपनाघर आश्रम


संस्था ने नहीं बताया कि उनके पास महिला काे रखने की जगह नहीं है। नहीं ताे महिला काे महिला एवं बाल विकास के किसी शेल्टर हाेम में भेजते। हमने उसे भाेपाल में रखने के लिए साैंपा था न कि भरतपुर भेजने के लिए।एके श्रीवास्तव, अधीक्षक हमीदिया अस्पताल


हमारे पास किसी तरह का फाेन नहीं अाया। चूंकि महिला से जुड़ा मामला था ताे हमीदिया प्रबंधन काे महिला एवं बाल विकास काे संपर्क करना था।
आरके सिंह, उपसंचालक सामाजिक न्याय विभाग



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तीन महीने बाद भी एक महिला केवल अपनाें के पास इसलिए नहीं पहुंच पा रही है क्याेंकि उसकी भाषा किसी काे समझ में नहीं आ रही


source https://www.bhaskar.com/mp/bhopal/news/no-one-is-able-to-understand-otherwise-she-reaches-her-home-126434576.html

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