रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद सिटी प्लानर प्रदीप वर्मा के विनय नगर स्थित घर पर ईओडब्ल्यू की टीम दोपहर लगभग 2.45 बजे पहुंची। टीम ने जब दरवाजे पर दस्तक दी तब घर पर मौजूद परिजन ने दरवाजा नहीं खोला। डीएसपी व टीम ने अपने परिचय पत्र दिखाए और पूरा कारण बताया तब भाई प्रशांत वर्मा ने दरवाजा खोला।
टीम का नेतृत्व कर रहे डीएसपी सतीश चतुर्वेदी के अनुसार टीम ने जब दरवाजे पर दस्तक दी तब प्रदीप के भाई प्रशांत व उनकी पत्नी वहां पहुंचीं, लेकिन दोनों ही दरवाजा खोले बिना वापस अंदर चले गए। इसके बाद टीम ने बताया कि वह पुलिस है और परिचय पत्र दिखाते हुए प्रदीप के पकड़े जाने की सूचना दी।
लगभग 15 मिनट बाद दरवाजा खोला गया। टीम ने जब घर की तलाशी शुरू की तो भारी मात्रा में नगर निगम की फाइलें व दस्तावेज मिले, इनकी गिनती रात तक चल रही थी। इस सामान को भी देर रात तक सूचीबद्ध किया जा रहा था।
अनुकंपा पर हुई प्रदीप वर्मा की नियुक्ति
प्रदीप वर्मा के पिता सूरज सिंह नगर निगम में सहायक स्वच्छता निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। उनकी मृत्यु के बाद 1995 में प्रदीप ने नगर निगम में टाइमकीपर के तौर पर नौकरी शुरू की और नौकरी करते हुए ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इस कारण उसकेे खिलाफ नियमित शिक्षा के साथ नियमित नौकरी करने के मामले की भी शिकायत की गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। 2004 में वर्मा उपयंत्री बना। 2012 में फर्जी तरीके से खुद को सहायक यंत्री बताकर सिटी प्लानर पद का प्रभार ले लिया।
नौ साल में चार बार जुगाड़ से बना सिटी प्लानर
सिटी प्लानर का पद कार्यपालन यंत्री या फिर अधीक्षण यंत्री स्तर के अधिकारी के लिए तय है, लेकिन उपयंत्री प्रदीप वर्मा ने जुगाड़ से नौ साल में 4 बार सिटी प्लानर का पद पा लिया था। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आने के बाद एक मंत्री की नजदीकी का फायदा उठाकर वर्मा चौथी बार 25 सितंबर 2019 को सिटी प्लानर के पद पर काबिज हुआ था, तब इस पद पर सरकार की ओर से नियुक्त कार्यपालन यंत्री ज्ञानेंद्र सिंह जादौन को हटाया गया था।
लोकायुक्त व ईओडब्ल्यू में लंबित हैं एक दर्जन मामले
वर्मा के खिलाफ लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू में 12 मामले लंबित हैं। इनमें सिंधी काॅलोनी में पहले से बने मकान की निर्माण मंजूरी देने व ब्लू लोटस कॉलोनी के निगम में बंधक प्लॉट समय से पहले मुक्त करने के मामले शामिल हैं। गलत तरीके से निर्माण मंजूरी के मामलों की भी शिकायतें की गईं, लेकिन ये सभी जांच के नाम पर लंबित हैं। इनमें ग्वालियर व मुरैना में रिश्तेदारों के गांव में जमीन खरीदना व लॉकडाउन के दौरान सिटी सेंटर में मां के नाम पर रजिस्ट्री कराने का मामला शामिल है।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/gwalior/news/the-door-did-not-open-when-the-bell-rang-the-eow-team-was-able-to-enter-the-id-127960394.html
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