कोरोना ने टीबी, कैंसर और एचआईवी सहित अन्य गंभीर बीमारियों व अंधत्व निवारण की रोकथाम से जुड़े कार्यक्रमों को ठप कर दिया है। अफसरों का ध्यान कोरोना पर होने से न तो रोगी समय पर ट्रेस हो पा रहे हैं और न समय पर इलाज हो रहा है। नतीजा यह अगली स्टेज में पहुंच रहे हैं। कुछेक तो खुले में घूमकर दूसरों में भी संक्रमण का खतरा बढ़ा रहे हैं। जून तक मोतियाबिंद के 600 रोगियों के ऑपरेशन हो जाना चाहिए थे, जो अब तक शुरू ही नहीं हो पाए हैं। इस साल अब तक टीबी के 412 और एचआईवी के 40 रोगी कम चिह्नित हो पाए हैं। इलाज के अभाव में ये अगली स्टेज में पहुंच रहे होंगे। इनसे दूसरों को भी खतरा है। सालभर में कैंसर के 120 नए रोगी भी बढ़ने की आशंका है। अप्रैल-मई में कैंसर के 47, टीबी के 15 व एचआईवी के एक रोगी की मौत भी हो चुकी है। ऐसे में स्वास्थ्य से जुड़े इन कार्यक्रमों को फिर से चालू करने की जरूरत है।
मार्च से शुरू हुए नए टारगेट पूरे करने के लिए वक्त नहीं मिला, अब सभी में पिछड़े
आंख की बजाय कोरोना का इलाज
- कार्यक्रम: अंधत्व निवारण
- 2019: मोतियाबिंद के 2400 ऑपरेशन किए थे
- अभी: अब तक 600 ऑपरेशन हो जाना थे, पर शुरू ही नहीं हो पाए क्योंकि माधवनगर अस्पताल में ऑपरेशन होते थे, अब वह कोविड अस्पताल है।
- असर: रोगी अगली स्टेज में पहुंच रहे हैं। आंखों का लैंस पक व फूल जाने पर तत्काल ऑपरेशन करना ही पड़ता है। वरना आंखों से दिखना बिल्कुल बंद हो जाता है।
कैंसर रोगियों के ऑपरेशन नहीं
- कार्यक्रम: कैंसर नियंत्रण
- 2019: रजिस्टर्ड व एक्टिव रोगी करीब 3900 थे। हर साल 600 रोगी बढ़ते हैं।
- अभी: रोगी बढ़े हैं। अप्रैल, मई व जून में 150 रोगी सामने आते थे। इस बार 175 से 180 सामने आए। उज्जैन के कैंसर अस्पताल में महीने भर की ओपीडी में औसतन 375 तक रोगी आते थे।
- असर: कुछेक रोगी गंभीर बने हुए हैं। कई के ऑपरेशन समय पर नहीं हो पाए। अप्रैल-मई में कैंसर के 47 रोगियों की मौत हुई।
टीबी के मरीजों से संक्रमण का खतरा
- कार्यक्रम: क्षय रोग उन्मूल एवं उन्मुखीकरण
- 2019: क्षय यानी टीबी रोग। पिछले साल 5609 रोगी चिह्नित किए जाकर इन्हें इलाज दिया गया था। इनमें से 1224 निजी अस्पतालों के जरिए सामने आए थे।
- अभी: जून तक विभाग द्वारा 1874 व निजी स्तर पर 518 रोगी चिह्नित किए जा चुके हैं, जो पिछले वर्ष से आधे भी नहीं हैं
- असर: पिछले वर्ष से तुलनात्मक 412 रोगी अभी कम चिह्नित हो पाए हैं। यानी ये इलाज के अभाव में घूम रहे हैं।
एड्स के रोगी कम चिह्नित हुए
- कार्यक्रम: एचआईवी नियंत्रण व रोकथाम
- 2019: 19701 लोगों के व 17700 गर्भवती महिलाओं के टेस्ट किए गए थे। इनमें 203 पाॅजिटिव आए थे।
- अभी: दोनों तरह के मिलाकर 21 हजार टेस्ट किए जा चुके हैं। इनमें से 60 पॉजिटिव रोगी सामने आए हैं।
- असर: साल का आधे से ज्यादा समय बीत चुका है। तुलनात्मक स्थिति में देखें तो टेस्ट भले ही ज्यादा हुए हों लेकिन पॉजिटिव रोगी कम चिह्नित हो पाए हैं।
चरक में ओटी खोलेंगे
कोरोना के चक्कर में पिछड़ गए हैं। आंखों की केवल ओपीडी ही चालू कर पाए हैं। ऑपरेशन वाले रोगियों को एमवायएच व चोइथराम जाने के लिए कहना पड़ रहा है। अब तक 600 ऑपरेशन मोतियाबिंद के होना चाहिए थे। प्रयास कर रहे हैं चरक में अस्पताल में जल्द ही ओटी शुरू कर दें।
डाॅ. नीलेश चंदेल, नोडल अधिकारी, अंधत्व निवारण
बाहर के रोगी आए
कोरोना से ज्यादा मौत कैंसर में होती है। जिन लोगों के पास पर्सनल व्हीकल है, वे तो इलाज के लिए आ जाते हैं, लेकिन बाकी परेशान हो रहे हैं। कहीं भी इलाज नहीं हो रहा है। उज्जैन में इलाज हो रहा है तो यहां आसपास के मरीज भी आने लगे हैं। ये भी वजह है यहां रोगी बढ़ने की।
डाॅ. सीएम त्रिपाठी, नोडल अधिकारी, कैंसर
टीबी का टारगेट पिछड़ा
पिछले वर्ष टीबी रोकथाम में उज्जैन मध्य प्रदेश में पहले स्थान पर था। कोरोना की वजह से पिछड़कर 34वें स्थान पर पहुंच गया था। प्रयास करने शुरू किए तो हम दसवें स्थान पर आ पहुंचे हैं। पूरा स्टाफ कोरोना की ड्यूटी में है। मैं स्वयं आरआरटी की नोडल अधिकारी हूं।
डाॅ. सुनीता परमार, नोडल अधिकारी, क्षय रोग
रोगी ट्रेस नहीं हो पाए
अभी भी अधिकतर स्टॉफ कोरोना में ही लगा हुआ है। बावजूद पूरे प्रयास किए जा रहे हैं कि एचआईवी रोगियों को समय रहते ट्रेस कर इलाज शुरू करवाया जा सके। इसके लिए विभिन्न स्तर पर प्रयास किए जाएंगे। रोगियों के इलाज के लिए सभी उपाय किए जा रहे हैं।
- डॉ. जीएस धवन, आरएमओ
ज्यादातर रोगियों की
लाॅकडाउन में मौत
चक्रतीर्थ के आंकड़े बताते हैं कि लाॅकडाउन के अप्रैल और मई में हार्ट अटैक, शुगर, बीपी, कैंसर, दमा, टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के 327 से ज्यादा लोगों की मौत हुई हैं। जो कि तुलनात्मक गत वर्ष के इन दो माह में 107 मौत अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन आंकड़ों के बढ़ने के पीछे समय पर इलाज शुरू नहीं होने व दवाई नहीं मिलना प्रमुख कारण हैं। यदि इलाज मिलता तो वे बच सकते थे।
दो किस्से: इलाज के लिए तड़पे और हो गई मौत
आगर रोड नाके के निवासी पूर्व पार्षद पंकज चौधरी की पत्नी प्रेम (34 साल) को कैंसर था। उनका फ्रीगंज के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। जांच कराने में काफी दिक्कतें थीं। पंकज बताते हैं पेट की एक बड़ी जांच के लिए उन्हें काफी परेशान होना पड़ा। आने-जाने की परमिशन नहीं होने से इंदौर में जिन डॉक्टर का इलाज चलता था, वह नहीं मिल पाए। यदि इंदौर ले जाते तो इलाज होता। 28 अप्रैल को प्रेम बाई की मृत्यु हो गई।
हरिनगर की 27 साल की नेहा देवड़ा की 27 अप्रैल को ब्लड कैंसर से मौत हो गई। उनके पति दीपक बताते हैं कि उनका इंदौर में इलाज चल रहा था। इंदौर जाने के लिए ऑनलाइन परमिशन के लिए खूब प्रयास किए पर परमिशन नहीं मिल सकी। अस्पताल उन्हें लेने को तैयार नहीं था। डॉक्टर से संपर्क नहीं हो रहा था। हमने यह भी कोशिश की कि डॉक्टर इलाज बता दें ताकि कुछ तो राहत मिल सके लेकिन कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सके।
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source https://www.bhaskar.com/local/mp/ujjain/news/120-cancer-patients-are-at-increased-risk-47-of-cancer-15-of-tb-and-one-hiv-patient-died-127546189.html
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