Sunday, March 1, 2020

सब याद रखा जाएगा, हमें मार दो हम भूत बन जाएंगे


पिछले सप्ताह लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम में रॉकस्टार रोजर विंटर्स ने एक भारतीय छात्र की कविता का अनुवाद प्रस्तुत किया। यह छात्र शाहीन बाग में जारी विरोध में शामिल है। कविता का अनुवाद कुछ इस तरह है-

‘सब याद रखा जाएगा,

हमें मार दो हम भूत बन जाएंगे,

हम इतने जोर से बोलेंगे

कि बहरे भी सुन लेंगे,

हम इतना साफ और बड़े अक्षर

में लिखेंगे कि अंधा भी पढ़ सके,

तुम धरती पर अन्याय लिखो

हम आकाश पर क्रांति लिखेंगे,

सब याद रखा जाएगा,

सब कुछ लिखित में दर्ज है...’

समारोह में इन पंक्तियों के पढ़े जाने पर श्रोताओं ने जोरदार तालियां बजाईं, जो दसों दिशाओं में गूंजने लगीं पर हुक्मरान ने कान में रुई ठूंस ली है। 76 वर्षीय रॉकस्टार रोजर विंटर्स ने कहा कि इस कविता को लिखने वाले युवा छात्र की मुट्ठी में भविष्य बंद है।

रोजर विंटर्स ने शाहीन बाग में जारी आंदोलन की बात की और आशा अभिव्यक्त की कि हमारे नाजुक विश्व में स्वतंत्रता और ज्ञान का प्रकाश फैलेगा। रोजर विंटर्स की बात तो हमें शैलेंद्र की फिल्म ‘जागते रहो’ के गीत की याद दिलाती है। ‘गगन परी गगरी छलकाए, ज्योत का प्यासा प्यास बुझाए, जागो मोहन प्यारे जागो, नगर-नगर डगर-डगर सब गलियां जागीं, जागो मोहन प्यारे मत रहना अंखियों के सहारे।’

संभवतः कवि ने प्रचार तंत्र के तांडव की पूर्व कल्पना कर ली थी। महाकवि कबीर आंखन देखी पर विश्वास करते थे और उन्हीं की परंपरा के शैलेंद्र आगाह करते हैं कि मत रहना अंखियों के सहारे। रॉकस्टार रोजर विंटर्स का भाषण ट्विटर मंच पर वायरल हो गया है और संभावना है कि व्यवस्था को बैक्टीरिया लग जाएगा। व्यवस्था पहले से ही बीमार है।

बहरहाल इम्तियाज अली की रणबीर कपूर अभिनीत फिल्म ‘रॉकस्टार’ के गीत इरशाद कामिल ने लिखे थे और संगीत ए आर रहमान का था। ज्ञातव्य है कि इरशाद कामिल पंजाब में हिंदी साहित्य में एम ए कर रहे थे। छात्र नेता ने परीक्षा को आगे बढ़ाने के लिए आंदोलन किया तो पढ़ने वाले छात्रों ने आंदोलन के खिलाफ अपना पक्ष रखा कि परीक्षा पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुरूप ही हो। उनका नारा था ‘साड्डा हक एथे रख’ और इसी से प्रेरित गीत इरशाद कामिल ने लिखा। आजकल इरशाद कामिल फिल्म निर्देशन के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं।

ज्ञातव्य है कि बीटल्स और रॉक असमानता और अन्यायपूर्ण आधारित व्यवस्था के खिलाफ रहे हैं और इसी मुखालफत से इस विद्या का जन्म भी हुआ है। जॉन लेलिन का संगीत एल्बम ‘इमेजिन’ सन 1971 में जारी हुआ था और इसने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। उनके गीत का आशय कुछ इस तरह था कि ‘मूर्ख एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर बीमार राजनेताओं की अर्थहीन बातों को सुनते-सुनते मेरे कान पक गए हैं और मैं थक गया हूं। मुझे सच जानना है, बराय मेहरबानी थोड़ा सा सच तो बता दो। हम कल्पना करें कि हमारे ऊपर कोई स्वर्ग नहीं है और ना ही हमारे पैरों के नीचे कोई नर्क है... कल्पना करें कि कोई सरहद नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, यह कल्पना करना कोई कठिन नहीं है कि ना तो कोई आदर्श मर जाने के लिए है और ना ही कुछ जीने के लिए, सारे मनुष्य सुख शांति से जी रहे हैं। आपको यह लगता है कि मैं स्वप्न देख रहा हूं, सच मानिए मैं अकेला स्वप्न नहीं देख रहा हूं। मैं आशा करता हूं कि आप मेरे साथ हैं किसी दिन पूरा विश्व एक कुटुंब की तरह हो जाएगा।’

गौरतलब है कि जॉन लेनिन की स्वर्ग और नर्क को नकारने की बात हमें ‘इप्टा’ के लिए लिखे शैलेंद्र के गीत की याद दिलाता है, ‘तू आदमी है तो आदमी की जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर।’

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने आर्तनाद किया, ‘केन रे भारत, केन तुई हाय, आवार हासिस! हासीवार दिन आहो कि एकनो ए घोर दुखे! अर्थात क्यों रे भारत, क्यों तू फिर हंस रहा है। इस घोर दुख में हंसने का दिन कहां रहा?’

गुरुदेव टैगोर की कविता का सारांश इस तरह है कि कोई नहीं जानता किस के बुलाने पर यह जल स्रोत कहां से आकर इस समुद्र में विलीन हुआ है। यहां पर आर्य, अनार्य, द्रविड़, चीनी, शक, हूण, पठान और मुगल एक साथ मिल गए। किसी दौर में चार्ली चैपलिन ने कहा था कि जिस दिन हम हंसते नहीं वह दिन खो देते हैं।

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक



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source https://www.bhaskar.com/mp/sagar/news/mp-news-all-will-be-remembered-kill-us-we-will-become-ghosts-063555-6754237.html

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