बड़वाह | भगवान शंकर व माता पार्वती के विवाह का प्रसंग बहुत मंगलकारी है। बारात भी विलक्षण थी। ऐसी बारात न किसी ने देखी और न देखेंगे। मदमस्त शिव के गण। कोई मुखहीन। कोई विपुल मुख। भस्म लगाए हुए शंकरजी। शंकर दूल्हा थे। लेकिन सांसारिक नहीं। वह अविनाशी व प्रलयंकर के रूप में थे। सब कहने लगे दूल्हा भी कभी ऐसा होता है क्या। उन्हें क्या पता था कि वह दूल्हे के नहीं बल्कि साक्षात शंकर जी के दर्शन कर रहे हैं। तीन दिन तक बारात ने वहां प्रवास किया। अब तो बारात कुछ घंटों की होती है लेकिन शास्त्रीय परंपरा के अनुसार तब बारात कई दिन ठहरती थी। सारे मंगल कार्य विधि विधान से होते थे। श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के तीसरे दिन कथावाचक पं. विजय शर्मा ने भगवान शिव पार्वती विवाह का विवाह प्रसंग सुनाते हुए कहा। उन्होंने कहा विवाह संस्कार पवित्र संस्कार है लेकिन आधुनिक समय में प्राणी संस्कारों से दूर भाग रहा है। जीव के बिना शरीर निरर्थक होता है। ऐसे ही संस्कारों के बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं होता। कथा में भूतों की टोली के साथ थिरकते हुए शिव जी की बारात आई। बारात का भक्तों ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। शिव पार्वती की सचित्र झांकी सजाई गई। महिलाओं ने मंगल गीत गाए व विवाह की रस्म पूरी की। महाआरती के बाद प्रसादी का वितरण किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।
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source https://www.bhaskar.com/mp/khargon/news/mp-news-shrimad-bhagwat-katha-marriage-is-a-sacred-ceremony-pt-vijay-sharma-063526-6676003.html
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